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मुँदरा में महँजी ने दो‑किनारा रणनीति की मांग, पोर्ट विकास और मत्स्य‑समुदाय के बीच संतुलन का संकेत

गुजरात के कच्छ जिले में स्थित मुँदरा, जिसमें भारत के सबसे बड़े निजी पोर्टों में से एक है, यहाँ पिछले हफ़्ते विधानसभा सदस्य एवं स्थानीय नेता महँजी ने ‘दो‑किनारा रणनीति’ की सार्वजनिक रूपरेखा पेश की। यह रणनीति, जैसा कि उन्होंने बतलाया, समुद्री व्यापारिक विस्तार और मत्स्य समुदाय के पारंपरिक अधिकारों को एक समान महत्व प्रदान करने का उद्देश्य रखती है।

गुजराती प्रशासन ने पहले ही मुंरदा पोर्ट के विस्तार के लिए कई अनुमोदन जारी कर दिए हैं, जिससे सड़कों का बोझ, शोर‑गूँज और जल‑प्रदूषण जैसी समस्याएँ बढ़ रही हैं। वहीं, मुँदरा के किनारे बसे कई मछुआरे अपने परिवारों के मुख्य आय स्रोत को खतरे में देखते हैं। महँजी का प्रस्ताव इन दो प्रवाहों को एक साथ चलाने की कोशिश करता है, जिसमें किनारे के एक हिस्से को मौजूदा औद्योगिक विकास से अलग कर एक ‘मछली‑संरक्षण‑क्षेत्र’ तय किया जाएगा, जबकि दूसरा किनारा निर्यात‑उन्मुख बंदरगाह सुविधाओं के लिए समर्पित रहेगा।

स्थानीय नगर निगम ने प्रस्ताव को स्वागत योग्य माना, परन्तु यह भी कहा कि योजना को कार्यान्वित करने के लिए स्पष्ट बजट, भूमि‑स्वामित्व की सफाई और पर्यावरणीय मंजूरी की आवश्यकता होगी। प्रशासनिक जटिलताओं के कारण अक्सर कागज़ी काम में महीनों‑सालों का समय लग जाता है, जिससे परियोजनाओं की वास्तविक जमीनी असर घट जाता है। इस मौजूदा ढाँचे में दो‑किनारा रणनीति को लागू करना एक ‘ताकि‑ताकि‑गंदा’ खेल जैसा भी लग सकता है, जहाँ कागज की स्याही से अधिक कंक्रीट और कोयले की धूल को हटाना पड़ेगा।

शहर के कई नागरिक संगठनों ने इस प्रस्ताव के प्रति मिश्रित प्रतिक्रियाएँ जताईं। कुछ ने इसे मौजूदा ‘एक‑किनारा’ नीति की असमानताओं को खत्म करने की दिशा में सकारात्मक कदम माना, जबकि अन्य ने कहा कि रणनीति के व्यावहारिक पहलुओं में अभी भी कई ‘छिद्र’ हैं। उदाहरण के रूप में, जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्री स्तर में वृद्धि से किनारे के संरक्षण क्षेत्र का आकार घट सकता है, जिससे गलत योजना पर बड़े खर्च का ख़तरा बन सकता है।

एक स्थानीय मछुआरे ने बताया, “अगर सरकार सच में दो‑किनारा नीति लागू करेगी तो हमें नई बॉटलिंग सुविधा, आपूर्ति‑शृंखला का सुधारा हुआ समर्थन और समुद्र की साफ‑सफाई की ज़िम्मेदारी भी मिलनी चाहिए, नहीं तो यह सिर्फ नाम का कदम रहेगा।” ऐसी आवाज़ें इस बात को उजागर करती हैं कि विकास‑पर्यावरण का संतुलन केवल शब्दों में नहीं, बल्कि व्यावहारिक सहयोग में ही संभव है।

अंततः, महँजी की दो‑किनारा रणनीति ने प्रशासन को एक चुनौतीपूर्ण दुविधा में डाल दिया है: तेज़ आर्थिक विकास की दर को बनाए रखते हुए, स्थानीय मत्स्य‑समुदाय और पर्यावरणीय संतुलन को कसौटी पर कसना। प्रशासन की अगली चाल यह तय करेगी कि यह योजना सिर्फ एक ‘नीति‑बयान’ रहेगी या वास्तविक धरातल पर ‘विकास‑सुरक्षा’ का मॉडल साबित होगी।

Published: May 7, 2026