बिहार की फिल्म विरासत के संरक्षण में नगर प्रशासन की असफलता उजागर
बिहार की फिल्मीय धरोहर, जो शैलेंद्र, चित्रगुप्त, कुमकुम और तिवारी जैसी दिग्गज शख्सियतों के साहित्य‑संगीत के मेल से विकसित हुई, आज भी स्थानीय पहचान का अहम हिस्सा है। इस परंपरा को संरक्षित करने का वादा कई साल पहले नगर परिषद ने किया था, परन्तु व्यावहारिक कदम अक्सर अधूरी योजनाओं की परतों में अटल रह गया है।
बिहार की सांस्कृतिक अनुभूति का स्रोत माना जाता है कि इस क्षेत्र ने बॉलीवुड को शुरुआती दौर में गीत‑संगीत की बुनियाद रखी। शैलेंद्र के गहराई वाले शब्द और चित्रगुप्त की मधुर धुनें उस समय के सिनेमा के स्वर को परिभाषित करती थीं, जबकि कुमकुम और तिवारी जैसे कलाकारों ने मंच को जीवंत कर दिया। इन हृदयस्पर्शी योगदानों को मान्यता देने हेतु नगर प्रशासन ने एक ‘फिल्म विरासत संग्रहालय’ तथा ‘सांस्कृतिक पथ’ की रूपरेखा प्रस्तुत की, परन्तु वित्तीय अनुदान की कमी और अनुबंध जारी करने में अनावश्यक औपचारिकता ने इस परियोजना को लम्बे समय तक रोका।
स्थानीय कलाकारों और पत्रकारों ने बताया कि अब तक कोई ठोस निर्माण कार्य नहीं हुआ, जबकि वही भवनों की सुरक्षा के लिए निरंतर लूट‑पैट्रोल और तख़्तापलट की खबरें सुनाई देती हैं। नगर के आधिकारिक दस्तावेज़ों में ‘संकल्पित’ कहा गया है, परन्तु जमीन‑जाँच, प्रदर्शनी‑डिज़ाइन और प्रकटयोजनाओं के बीच का अंतराल इस बात का संकेत देता है कि प्रशासनिक कुशलता की जगह कागज‑पड़ती की ही प्रबलता है।
बिना स्पष्ट समयसीमा के इस अभिप्रेत परियोजना में देरी से न केवल संभावित दर्शकों को निराशा होती है, बल्कि बिहार के मौलिक सांस्कृतिक आयाम को राष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाने की संभावनाओं पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। नागरिकों ने सामाजिक मंचों पर इस पर सवाल उठाते हुए उल्लेख किया कि यदि प्रशासन अपने काम को ‘फिल्मी ड्रामा’ बना ले तो भी कम से कम दर्शकों को बेहतर लुभावना लाभ मिल सके।
प्रशासन के उत्तर में एक अधिकारी ने कहा कि बजट बाधाओं के कारण प्रगति धीमी है, परन्तु यह बयान कई बार सुनवाई के बाद भी ‘सारांशहीन’ ही प्रतीत होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि विभागीय समन्वय को मजबूत किया जाए और निजी भागीदारी को प्रोत्साहित किया जाए, तो इस प्रकार के सांस्कृतिक प्रकल्प समय पर समाप्त हो सकते हैं।
बिहार की फिल्मीय धरोहर को उचित संरक्षण नहीं मिलने पर स्थानीय समाज के मनोबल पर प्रश्न चिन्ह लगाते हुए कहा जा सकता है कि सही नीतियों और कुशल प्रशासन का अभाव ही इस ‘विरासत’ को एक ‘सुबह की सौगंध’ बना कर रख रहा है।
Published: May 3, 2026