बॉम्बे उच्च न्यायालय ने गोवा के पूर्व मुख्य मंत्रियों के खिलाफ मनी-लॉन्डरिंग केस को रद्द किया
बॉम्बे उच्च न्यायालय ने आज के सुनवाई में यह निर्णय दिया कि दिगंबर क़मत और चर्चिल अलेमाओ, दोनों ही गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री, के विरुद्ध पब्लिक मैनी-लॉन्डरिंग एक्ट (PMLA) के तहत चल रही कारवाई अस्थिर है। कारण के रूप में न्यायालय ने यह उकेर दिया कि लागूकर्ता एजेंसी, इन्फ़ोर्समेंट डायरेक्टरेट (ED), ने सार्वजनिक पदधारी को अभियोजन के लिए आवश्यक सरकार की पूर्व स्वीकृति प्राप्त नहीं की थी।
अनुसार, ED ने विशेष न्यायालय में मुकदमा दाखिल करने से पहले प्रशासनिक प्रोटोकॉल की अनदेखी की थी, जिससे न्यायालय ने प्रक्रिया को शून्य कर दिया। इस त्रुटि के कारण विशेष न्यायालय ने अपराध के ज्ञान को स्वीकार नहीं किया और आरोपी अधिकारियों को जारी किया गया समन भी निरस्त कर दिया गया।
न्यायिक टिप्पणी में यह स्पष्ट किया गया कि सार्वजनिक पदाधिकारियों के विरुद्ध आपराधिक कार्यवाही में सरकारी मंजूरी एक अनिवार्य शर्त है, जिसे अनदेखा करने से न केवल कानूनी प्रक्रिया बिगड़ती है, बल्कि जनविश्वास पर भी धूमिल पड़ता है। इस पहलू की उपेक्षा को “क़ानूनी कागज़ों के ढेर में खो गई लापरवाही” कहा गया।
यह फैसला स्थानीय प्रशासन और एंडी (ED) के बीच कार्यप्रणाली में स्पष्ट खामियों को उजागर करता है। नागरिकों ने अक्सर भ्रष्टाचार विरोधी अभियानों को तेज़ और पारदर्शी आशा के रूप में देखा है, परन्तु इस मामले में क़दमों की अनिहित गति नीतियों के अनुपालन में अटकाव का प्रतीक बनी हुई है।
प्रभाव के दायरे में इस निर्णय का सबसे बड़ा असर यह है कि सरकारी अनुज्ञा की आवश्यकता को दोबारा सामने लाया गया, जिससे भविष्य में इसी प्रकार की प्रक्रिया में नयी सावधानी बरती जाएगी। यदि ऐसी खामियों को ठीक नहीं किया गया, तो सार्वजनिक संस्थाओं के बीच विश्वास का पुल बार-बार टूट सकता है, जिससे नागरिक सेवाओं और विकास परियोजनाओं में देरी हो सकती है।
गुज़रते समय, न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि यह रद्दीकरण भविष्य में न्यायिक प्रक्रिया की शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए एक अनुशासनात्मक उदाहरण बन सकता है। इस दिशा में, प्रशासनिक ढांचों को नियामक आदेशों के अनुपालन में सुदृढ़ करना अनिवार्य है, ताकि “क़ानून की किताबों में लिखी हुई राह” वास्तविक कार्यवाही में भी स्थिर बनी रहे।
Published: May 5, 2026