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पुणे में पिता को 20 साल जेल, 13 साल की बेटी के बलात्कार के लिये सजा दी गई
पुणे उच्च न्यायालय ने 20 मई को एक स्पष्ट संदेश दिया: घर की चारदीवारी में भी यदि सुरक्षा नहीं, तो जेल की दीवारें कड़ी होती हैं। अदालत ने 45 वर्षीय पिता को अपने 13 वर्षीय बच्ची के साथ बलात्कार करने के आरोप में दो दशकों की कठोर सजा सुनायी। उनका आरोप भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (बलात्कार) तथा बाल हत्या संरक्षण अधिनियम की धारा 3 (बाल शोषण) के तहत था।
आरोपियों ने 2025 में पहली बार इस दुर्भावनापूर्ण कृत्य की सूचना स्थानीय पुलिस को दी थी। प्रारंभिक जांच में यह उजागर हुआ कि पीड़िता ने कई बार अपने पिता से शारीरिक अत्याचार का सामना किया था, परन्तु सामाजिक stigma और आर्थिक दबाव के कारण यह मामला बाहरी प्राधिकरण तक नहीं पहुँचा। अंततः, एक सामाजिक कार्यकर्ता की मदद से पुलिस ने मामला दर्ज किया, जिससे कोर्ट तक पहुंचने में दो साल का समय लगा।
पुणे पुलिस ने केस फाइलिंग के बाद तत्काल इंटरेक्टिव काउंसलिंग और सुरक्षा उपायों की अनुशंसा की, लेकिन शहरी प्रबंधन विभाग ने अभिभावकीय निगरानी के लिए कोई विशेष कार्यक्रम नहीं बनाया। यह स्पष्ट है कि पुणे के ‘सुरक्षित शहर’ के बीरोपीसमें सुरक्षा उपायों की योजना में घर-परिवार के भीतर सुरक्षा को नजरअंदाज किया गया। किस्मत न थी कि इस कदम को तेज़ किया जाता, तो इस तरह के मामलों की पुनरावृत्ति रोकी जा सकती थी।
सजायुक्त न्यायाधीश ने निर्णय सुनाते हुए कहा, “समीक्षक मंत्री द्वारा घोषित ‘बचपन को सुरक्षित रखने की पहल’ केवल शब्दात्मक रहेगा जब तक कि घर के भीतर की सुरक्षा के लिये ठोस कदम नहीं उठाए जाते।” यह टिप्पणी न केवल न्यायालय की प्रतिबद्धता को उजागर करती है, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही पर भी एक सूखी तंज है।
समुदाय में इस निर्णय को लेकर मिश्रित प्रतिक्रियाएँ देखी गईं। कई नागरिकों ने प्रवर्तन में देरी पर प्रश्न उठाए, जबकि अन्य ने न्याय प्रणाली में भरोसा जताते हुए कहा कि “भले ही न्याय की राह लंबी हो, अंततः सच्चाई को मंज़िल मिलती है”। सामाजिक कार्यकर्ता समूह ने कहा कि पुलिस, न्यायपालिका और नगर निगम को मिलकर बाल सुरक्षा के लिए एकीकृत डेटाबेस और निवारक कार्यक्रम बनाना आवश्यक है।
यह मामला सिर्फ एक दंडात्मक कार्रवाई नहीं, बल्कि एक चेतावनी है कि सतही बुनियादी ढाँचे—जैसे साफ़ सड़कों और जल निकासी—से अधिक महत्वपूर्ण है घर के भीतर की सुरक्षा व्यवस्था। यदि इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में ऐसे “पारिवारिक अपराध” फिर से उजागर हो सकते हैं, और न्यायालय फिर से वही 20‑वर्षीय सजाओं का मंचन कर सकता है।
Published: May 7, 2026