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निशांत कुमार ने संभाला बिहार का स्वास्थ्य मंत्रालय, सुलभ स्वास्थ्य देखभाल का वादा
बिहार के स्वास्थ्य मंत्री पद पर नई उम्र के नेत्रित्व का आगमन हुआ, जब नीलकंठ सिंह सिद्धुपति के पूर्ववर्ती, निशांत कुमार ने 9 मई को पदभार संभाला। सरकार ने उन्हें ‘सभी के लिये सुलभ स्वास्थ्य’ के वादे के साथ प्रस्तुत किया, जिससे राज्य के असमान स्वास्थ्य सुविधाओं को सुदृढ़ करने की योजना पर प्रकाश डाला गया।
निशांत कुमार, जो अभी-अभी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे के रूप में परदे पर आए हैं, ने कहा कि उनका प्राथमिक लक्ष्य मौजूदा स्वास्थ्य योजनाओं के त्वरित कार्यान्वयन और नई सुविधाओं का निर्माण होगा। उन्होंने कई ग्रामीण क्लीनिकों की स्वचालन, गरीबों के लिये निःशुल्क दवा वितरण और मातृ‑शिशु स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देने का आश्वासन दिया। इन वादों को दोहराते हुए उन्होंने कहा, “हमारी प्राथमिकता हर घर तक स्वास्थ्य सेवा पहुँचना है, चुनावी व्यंजनों से आगे नहीं, बल्कि वास्तविक जरूरतों से आगे है।”
राज्य के स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे पर आलोचनात्मक नजर रखी गई है। पिछले वर्ष में ही कई सरकारी अस्पतालों में बुनियादी उपकरणों की कमी और डॉक्टरों की कमी रिपोर्ट हुई थी। ग्रामीण इलाकों में लगभग 35% जनसंख्या को निकटतम प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक पहुँचने में दो घंटे से अधिक समय लगता है। ऐसे परिप्रेक्ष्य में स्वास्थ्य मंत्री के वायदे को ‘वायवीय ध्वनि’ बनाकर देखना आसान नहीं है।
वहीं, इस नियुक्ति को विपक्ष के प्रमुख हस्ती तेजस्वी यादव ने ‘विरासत में मिली पदावली’ के रूप में टिका कर निंदा की। उन्होंने कहा कि बिना निर्वाचन मंडल के समर्थन के नियुक्ति ‘जन प्रतिनिधित्व के सिद्धांत’ के विरुद्ध है, और यह ‘डायनैमिक लोकतंत्र’ की तरह नहीं, बल्कि ‘परिवारिक राजनैतिक खेल’ की तरह दिखती है। यादव ने स्पष्ट किया कि “स्वास्थ्य जैसी महत्वपूर्ण नीति में जनसंख्या का भरोसा तभी बनता है जब निर्णय समर्थित मुखर आवाज़ से आए, न कि पारिवारिक वारिस के फ़ैसलों से।”
इस राजनीतिक टकराव ने नागरिकों के बीच उलझन उत्पन्न कर दी है। जबकि बिहार में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच में सुधार की आशा कई गृहस्थों के लिये बड़ी राहत का वादा करती है, वहीं सरकारी पदों की विरासतवादी घोटाला इस भरोसे को धूमिल कर सकता है। नागरिक संगठनों ने पहले ही ‘सभी के लिये स्वास्थ्य’ के नारे के साथ सार्वजनिक सुनवाई की मांग कर रखी है, जिससे योजना के कार्यान्वयन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।
आगे देखते हुए, विशेषज्ञों का मानना है कि मंत्री के प्रचारित नीतियों को जमीन स्तर पर लागू करने के लिये स्पष्ट बजट आरक्षण, स्थानीय स्वास्थ्य कर्मियों की नियुक्ति और निगरानी तंत्र का सुदृढ़ीकरण आवश्यक होगा। बशर्ते ये कदम केवल कागज़ी वादे तक सीमित न रहें, बल्कि वास्तविक उपयोगकर्ता—बिहार के सामान्य नागरिक—के जीवन में अंतर लाएँ, तभी यह नई नियुक्ति ‘स्वास्थ्य मंत्री’ के बजाय ‘स्वास्थ्य सुधारक’ के रूप में याद रखी जाएगी।
Published: May 9, 2026