नोएडा के प्रमुख बुनियादी ढाँचा प्रोजेक्ट्स अब भी कागज़ी उलझन में फँसे
नोएडा नगर निगम ने कई वर्षों से महत्त्वपूर्ण बुनियादी ढाँचा प्रोजेक्ट्स को तेज़ी से पूरा करने का वादा किया था। पर वास्तविकता कुछ और ही दिखा रही है। 2.2 किमी लंबा वैधकृत सड़क विस्तार, एक टोल प्लाज़ा और एक एसपीआर (सॉलिड वैस्ट प्रोसेसिंग एंड री-साइक्लिंग) इकाई—तीनों को अब भी दस्तावेज़ी काम‑काज, जमीन अधिग्रहण के मुठभेड़ और अनुबंधी अड़चनों में फँसा हुआ माना जा रहा है।
सड़कों के मामले में, 2023 में प्रारम्भ हुए 2.2 किमी की चौड़ाई बढ़ाने की योजना के लिये नवीनीकरण अनुबंध जारी किया गया था। शुरुआती शर्तों के अनुसार, कार्य को दो साल में समाप्त करना था, जब तक शहर के दो व्यस्त मार्गों के बीच की भीड़भाड़ को कम किया जा सके। परंतु बजट मान्यता के बाद, अनपेक्षित जमीन अधिग्रहण विवाद और कई बार पुनः‑तौर‑पर बदलते कॉन्ट्रैक्टर का चयन, इस परियोजना को अब दो वर्षों से अधिक समय तक रुकावट में रख रहा है। नागरिकों ने बताया कि इस रास्ते पर अभी भी अनियंत्रित ट्रैफ़िक जाम है, जिससे दैनिक यात्रा समय में औसतन 30‑45 मिनट की वृद्धि हो रही है।
टोल प्लाज़ा की स्थिति और भी उलझी हुई है। मूल रूप से नियोजित था कि नई बनियादिया‑बीमार रोड के प्रवेश द्वार पर एक आधुनिक टोल सेंटर स्थापित किया जाये, जिससे राजस्व वृद्धि के साथ साथ रखरखाव के खर्च को कम किया जा सके। परंतु पर्यावरण मंज़ूरी में देरी, तथा टोल रेट को लेकर स्थानीय व्यवसायियों और नागरिक समूहों के बीच विवाद ने इस परियोजना को शून्य गति पर पहुंचा दिया है। आज भी वही प्लेज़ा के निर्माण स्थल पर कंक्रीट मिश्रण की टंकी ख़ाली पड़ी है, जबकि स्थानीय वाहन चालकों को अनौपचारिक रूप से निकाले गए विकल्पों पर निर्भर रहना पड़ रहा है।
शहर की सफाई और कचरा प्रबंधन के लिए घोषित एसपीआर इकाई का भी वही भाग्य है। 2024 में अनुमोदित इस योजना का उद्देश्य नगर के सॉलिड वैस्ट को 60 प्रतिशत तक रीसाइक्लिंग और जैविक उपचार करके लैंडफिल के बोझ को घटाना था। लेकिन अनुबंध के लिए निविदा प्रक्रिया में कई बार संशोधन, तकनीकी मानकों पर असहमति और फिर से फंडिंग ट्रांसफर में देरी ने इस परियोजना को आज तक ‘ड्राफ्ट मोड’ में रख दिया है। परिणामस्वरूप, नगर के कई इलाकों में अभी भी खुले में कचरा ढेर हो रहा है, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरणीय संतुलन दोनों को जोखिम में डाल रहा है।
नगरपालिका ने इन समस्याओं के समाधान के लिए एक विशेष कार्यदल का गठन किया और प्रत्येक परियोजना के लिए सख्त समयसीमा निर्धारित की। फिर भी, नियामक निकायों की पारस्परिक असहमति, अधीनस्थ विभागों की अकार्यक्षमता और उच्च पदस्थ अधिकारियों के बीच पारस्परिक कट्टरता ने इस कार्यदल को भी प्रभावी बनाने में बाधा उत्पन्न की। स्थानीय MLA ने कहा, “यदि हम कागज़ी काम‑काज को गति नहीं दे पाएंगे, तो विकास का कोई भी नक्शा हवा में उड़ता रहेगा।”
नागरिकों के दृष्टिकोण से बात करें तो उन पर आर्थिक और सामाजिक बोझ दोनों बढ़ रहे हैं। ट्रैफ़िक जाम के कारण ईंधन खर्च में वृद्धि, टोल प्लाज़ा के अभाव में वैकल्पिक मार्गों पर लगने वाला समय, और कचरा प्रबंधन की विफलता से पड़ोस में स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का उभरना, ये सभी समस्याएँ क्रमशः रोज़मर्रा की जिंदगी में उलझी हुई हैं।
परियोजनाओं के निर्वहन में होने वाली इस ‘प्लान‑टु‑पैरालिसिस’ स्थिति न केवल प्रशासनिक अनुशासन की कमी दर्शाती है, बल्कि शहर के विकास मॉडल पर भी सवाल उठाती है। एक उपनगर जो दिल्ली‑एनसीआर के विस्तार के साथ तेजी से बढ़ रहा है, उसे अब ज़रूरत है तेज़, पारदर्शी और जवाबदेह प्रशासनिक कार्रवाई की—ताकि प्रतिबद्धता से अधिक वास्तविकता निकले।
Published: May 3, 2026