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दाहोद बांध में 18 वर्षीय युवक की दुर्दशा: सुरक्षा ढाल में छेद उजागर

गुजरात के दाहोद जिले में स्थित बांध के किनारे 18‑वर्षीय राजू (उपनाम) ने 5 मई को जल में छलाँग लगाते ही डूबते हुए अपना जीवन समाप्त कर दिया। स्थानीय समाचार के अनुसार, वह अपने मित्रों के साथ जलाशय के पास मछली पकड़ने के लिये गया था, जब अचानक तेज़ धारा ने उसे ग्रास लिया। घटनास्थल पर मौजूद पुलिस और जलरोधक विभाग को तुरंत सूचना मिली, पर बचाव कार्य में कई तकनीकी बाधाएँ सामने आईं।

बचाव कर्मियों ने नजदीकी कुत्ता‑पुलिस स्टेशन, जलरक्षा दल और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन बल (NDRF) को तैनात किया। प्रारम्भिक प्रयासों में बोट की कमी और धारा की तीव्रता कारण कार्य धीमा रहा, जिससे मृत शरीर को 45 मिनट में ही बरामद किया गया। फिर भी, इस तेज़ प्रतिक्रिया को कुछ स्थानीय लोगों ने “सर्दियों की चाय की तरह गरम” कहा, जो प्रशासन की तत्परता पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी को दर्शाता है।

प्रकरण की जांच में स्पष्ट हुआ कि बांध के आसपास सुरक्षा मतपत्र, चेतावनी संकेत और लाइफ़ जैकेट के प्रावधानों का अभाव था। ग्राउंड‑लेवल प्रशासन ने पिछले साल ही जलजलों के किनारे प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की थी, पर उस निर्देश का अमलीकरण अभी तक नहीं हुआ। यह तथ्य दर्शाता है कि नियम बनाने में तो दिल लगाना आसान है, पर उनका पालन कराना अक्सर कठिन।

दाहोद नगर विकास आयोग (नग) ने घटना के बाद तत्काल एक स्वतंत्र जांच आयोग स्थापित करने की घोषणा की। अधिकारी महाविकास ने कहा, “हम जाँच के निष्कर्षों के आधार पर जिम्मेदार कर्मचारियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करेंगे तथा पीड़ित के परिवार को उचित मुआवजा प्रदान करेंगे।” हालांकि, मुआवजे की प्रक्रिया अक्सर कागज़ी कार्रवाई में फस जाती है, जिससे दु:खियों को अतिरिक्त कष्ट सहने पड़ते हैं।

स्थानीय नागरिकों ने सामाजिक मीडिया पर इस घटना को ‘हर साल की ही कहानी’ कहा, जहाँ “बांध के किनारे शाम की सैर” को अक्सर “खून के पसीने” की चेतावनी के रूप में देखा जाता है। कई परिवारों ने अपनी माँग रखी कि भविष्य में लाइफ़ गार्ड नियुक्त किए जाएँ और चेतावनी संकेत स्पष्ट रूप से स्थापित किए जाएँ।

यह घटना न केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी को उजागर करती है, बल्कि गुजरात में जलाशयों के प्रबंधन में नज़रअंदाज़ की जाने वाली कई ख़ामियों को भी सामने लाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि बाढ़, जलदुरुपयोग और मनोविज्ञानिक जोखिमों को मद्देनज़र रखते हुए एक व्यापक सुरक्षा नीति बनाना अब अनिवार्य है, नहीं तो “बांध के किनारे” शब्द का अर्थ ‘मौत का ठिकाना’ से अधिक नहीं रहेगा।

Published: May 6, 2026