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देब्रीगढ़ वन्यजीव अभयारण्य में लोहे की जालबाड़ से बाढ़ती सुरक्षा, बाघ प्रवास की राह साफ

ओडिशा के देब्रीगढ़ वन्यजीव अभयारण्य ने 120 किमी की सीमा पर लोहे की जालबाड़ स्थापित करने की योजना को लागू किया है। यह कदम वन विभाग की ओर से शिकार को रोकने, खेतों व पशुधन पर हमले घटाने और भविष्य में बाघों के स्थानांतरण को सुगम बनाने के उद्देश्य से उठाया गया है।

अभयारण्य के चारों ओर बाड़ लगाकर मानव‑व्याघर टकराव को कम करने की कोशिश में प्रशासन ने स्थानीय किसानों और पशुपालकों से पूर्व सहमति ली। इस प्रक्रिया में आगजनी या इंधन संग्रह के लिये सीमित प्रवेश नियंत्रण भी रखा गया है, जिससे ग्रामीणों की आजीविका पर न्यूनतम प्रतिबंध रहे।

परियोजना के पीछे मुख्य प्रेरणा दो‑मुखी है: पहले, जंगली पशुओं द्वारा कृषि क्षेत्रों में लगातार हुए नुकसान को रोकना; दूसरे, बाघों के पुनर्वास एवं स्थानांतरण के लिये अभयारण्य को ‘नीरॉ बिकाज़’ (त्रुटिरहित) बनाना। वन विभाग के अधिकारियों का मानना है कि जालबाड़ के बिना बाघों को बड़े दूरी पर ले जाना जोखिमभरा रहेगा, क्योंकि बिना सीमा के अपरिचित क्षेत्रों में बाघों को मानवीय घातक मामलों का सामना करना पड़ सकता है।

स्थानीय प्रशासन ने बताया कि फेंसिंग कार्य के लिये लगभग 3.5 करोड़ रुपए की लागत अनुमोदित की गई है, जिसमें आयरन वायर, कंक्रीट पिलर और तकनीकी निगरानी उपकरण शामिल हैं। कार्य प्रारम्भिक रूप से दो महीने में पूर्ण होने का लक्ष्य रखा गया था, परंतु निर्माण सामग्री की देर से आपूर्ति और मौसमी बाधाओं ने समय‑सीमा को थोड़ा बढ़ा दिया।

फेंसिंग पर ग्रामीणों की प्रतिक्रियाएँ सामान्यतः सकारात्मक रही हैं, लेकिन कुछ ने संकेत दिया कि बाड़ के दीर्घकालिक रख‑रखाव की लागत और निरंतर निगरानी पर प्रश्न उठेगा। "जैसे‑जैसे जालबाड़ लगती है, हमें चिंता है कि दीवार नहीं, तो बाड़ के नीचे चुप‑चाप घुसने वालों को कैसे रोकेंगे", एक गाँव के वरिष्ठ किसान ने कहा।

आलोचक इस बात को भी उजागर कर रहे हैं कि ऐसी बड़ी योजना में अक्सर कागज पर स्याह, ज़मीन पर धुंध रह जाता है। सतत निगरानी, स्थानीय समुदाय के सशक्तिकरण, और बाड़ के रख‑रखाव के लिये स्पष्ट फंडिंग मॉडल के अभाव में भविष्य में वही समस्याएँ दोबार हो सकती हैं, जो पहले से ही कई वन्यजीव अभयारण्यों में देखी गई हैं।

फेंसिंग कार्य के पूरा होने के बाद, राज्य वन अधिकारी बाघ प्रवास के लिये अभयारण्य को संभावित स्रोत बनाते हुए, जालबाड़ को अभयारण्य के भीतर जलवायु‑परिवर्तन एवं आवास‑विनाश से बचाव के अतिरिक्त कवच के रूप में उपयोग करने की आशा व्यक्त कर रहे हैं। बाघों के सुरक्षित स्थानांतरण के साथ, कृषि क्षेत्र में क्षति और मानव‑व्याघर टकराव में घटाव की उम्मीद भी पूरी तरह से आंकलन के योग्य बन गई है।

संक्षेप में, देब्रीगढ़ अभयारण्य में जालबाड़ का प्रावधान एक प्रायोगिक कदम है, जो पर्यावरण सुरक्षा, स्थानीय समाज और वन्यजीव संरक्षण के बीच संतुलन बनाने का प्रयास करता है। यदि इसे निरंतर देख‑रेख और स्थानीय सहभागिता के साथ लागू किया गया, तो यह मॉडल देश के अन्य अभयारण्यों के लिये मार्गदर्शक बन सकता है।

Published: May 5, 2026