तेलंगाना में स्कूल फीस पर रोक की मांग: अभिभावकों, छात्र संगठनों और शिक्षाविदों ने किया तीखा आह्वान
तेलंगाना के कई जिलों में निजी तथा सरकारी-प्रायोजन वाले स्कूलों में शुल्क वृद्धि की लहर ने अभिभावकों, छात्र संघों और शिक्षाविदों के बीच असहजता पैदा कर दी है। वर्ष‑दर‑वर्ष बढ़ती फीस को लेकर तनाव की सीमा पहुँचते‑ही, तीन प्रमुख समूहों ने सामूहिक रूप से राज्य सरकार से तत्काल नियमन की मांग की है।
परिवारों का कहना है कि शुल्क वृद्धि की वार्षिक दर अक्सर मौद्रिक दर से कई गुना अधिक होती है, जिससे मध्यम वर्ग के विद्यार्थी भी शिक्षा के अधिकार से वंचित हो रहे हैं। एक अभिभावक समूह के प्रवक्ता ने कहा, “जब हमें लगता है कि आमदनी की थाल में थोड़ी‑सी रिफ़्रेशमेंट हो रही है, तभी स्कूल का बिल दो‑तीन गुना बढ़ जाता है। यह न केवल असहनीय है, बल्कि मौलिक समानता के सिद्धांत के विरुद्ध भी है।”
छात्र संघों ने भी इस मुद्दे को अपनी एजेंडा में प्रमुखता से रखा है। वार्षिक बजट बैठकों में उन्होंने “शिक्षा को व्यापार नहीं, सार्वजनिक सेवा बनाकर रखें” का नारा दिया। संघ के प्रमुख ने बताया कि कई कॉलेज‑प्राथमिक संस्थानों ने पिछले दो सालों में 30 % से अधिक शुल्क वृद्धि की है, जबकि वेतन वर्दी या छात्रवृत्ति में कोई समतुल्य वृद्धि नहीं हुई।
शिक्षाविदों की राय में, अभिभावकों और छात्रों की असंतुष्टि केवल आर्थिक बोझ ही नहीं, बल्कि शैक्षणिक गुणवत्ता के गिरते मानकों से भी जुड़ी हुई है। “जैसे ही शुल्क बढ़ता है, कई संस्थान खर्च बचाने के लिए सुविधाएँ घटाते हैं—लाइब्रेरी, प्रयोगशाला, खेलकूद के क्षेत्र—और अंत में छात्रों को और अधिक शुल्क देना पड़ता है। यह एक चक्रव्यूह है,” एक प्रोफेसर ने टिप्पणी की।
प्रशासन की ओर से, तेलंगाना शिक्षा विभाग ने कहा कि वह वर्तमान में एक व्यापक सर्वेक्षण कर रहा है और “रिलेशनशिप‑मॉडल” के तहत शुल्क नियमन हेतु एक आकस्मिक समिति गठित करेगा। विभाग के अधिकारी ने अखबार के प्रश्न पर कहा, “हम समझते हैं कि शुल्क वृद्धि के पर्यवेक्षण में परिपूर्णता की आवश्यकता है, परन्तु इसे लागू करने के लिए हमें सभी स्टेकहोल्डर्स के साथ संवाद स्थापित करना होगा।” यह जवाब कई आवाज़ों के लिए पर्याप्त नहीं रहा।
नागरिक समाज ने इस बयान को “दीर्घकालिक समाधान का वादा, तत्काल कार्यवाही का अभाव” कहा। सोशल मीडिया पर कई अभिभावकों ने यह नोट किया कि यदि सरकार ने नियमन में देरी की, तो वह शिक्षा के लोकतांत्रिक सिद्धांत को व्यावसायिक स्वार्थ के आगे झुकाते देखेगी।
वर्तमान में मांग पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं होने के कारण, अभिभावक संघ, छात्र संघ और शिक्षाविदों ने अगले दो हफ्तों में बड़े स्तर पर धरना और रैलियों की योजना बनायी है। उनका उद्देश्य न केवल शुल्क नियमन का आदेश लेना है, बल्कि शिक्षा नीति में पारदर्शिता और जवाबदेही को स्थापित करना भी है।
वहीं, शिक्षा मंत्रालय का मुड़कर जवाब यह दर्शाता है कि इस मुद्दे को लेकर राज्य में अभी भी “नीति‑परिचालन का अंतर” मौजूद है। यह अंतर तब तक समाप्त नहीं होगा जब तक सभी संबंधित पक्ष—सरकार, स्कूल प्रबंधन और नागरिक समाज—परस्पर समझौते के साथ वास्तविक नियम लागू नहीं कर देते।
Published: May 6, 2026