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Category: शहर

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जैसलमेर में लावण्या की गिनती 73 से घटकर 41, नगरपालिका की चूक पर प्रश्न

जैसलमेर जिले के जल-आश्रयों पर हालिया सर्वेक्षण ने राज्य पक्षी लावण्या (ग्रेट इंडियन बस्टर्ड) की जनसंख्या में आश्चर्यजनक गिरावट दर्ज की। पिछले वर्ष 73 प्रमाणित पंछियों की रिपोर्ट हुई थी, जबकि इस साल वहीँ केवल 41 ही देखी गईं। यह आंकड़ा न केवल जैव विविधता को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि स्थानीय प्रशासन की पर्यावरणीय जिम्मेदारी पर भी सवाल उठाता है।

विद्वानों का मानना है कि गिरावट के प्रमुख कारणों में आवास क्षरण, बढ़ते पावर लाइन नेटवर्क और आवारा कुत्तों द्वारा उत्पन्न खतरे शामिल हैं। जल-आश्रयों की घटती संख्या और शोषित भूमियों ने लावण्या के प्रजनन स्थल को गंभीर रूप से प्रभावित किया है, जबकि उच्च वोल्टेज लाइनों के नीचे का आवास विद्युत चमक के कारण पंछियों को डराता है। आवारा कुत्ते, जो अक्सर गाँव‑गांव में बिखरे रहते हैं, लावण्या के अंडों और बछड़ों पर शिकार के समान जोखिम बन चुके हैं।

इन पर्यावरणीय चिंताओं के सामने नगरपालिका द्वारा उठाए गए कदम असंगत प्रतीत होते हैं। जल-आश्रयों के पुनरुद्धार या संरक्षण के लिए विशेष बजट आवंटन का उल्लेख नहीं किया गया, जबकि उसी वित्तीय वर्ष में सड़कों की मरम्मत और शहर की रोशनियों के विस्तार पर बड़े खर्चे हुए। पावर कंपनी के साथ समन्वय के बारे में भी स्पष्ट दिशा‑निर्देश नहीं दिखाते, जिससे लावण्या के मार्गों पर नई लाइनों का विस्तार जारी है।

स्थानीय लोगों के बीच इस गिरावट को आर्थिक प्रभाव भी महसूस हो रहा है। जैसलमेर, जो पर्यटन में लावण्या को एक विशिष्ट आकर्षण मानता है, अब संभावित दर्शकों की अपेक्षा में कमी देख रहा है। साथ ही, पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ने से भविष्य में कृषि‑पशुपालन क्षेत्रों में अनपेक्षित परिवर्तन हो सकते हैं, जो ग्रामीण आय पर प्रतिकूल असर डालेंगे।

वित्त एवं पर्यावरण विभाग के एक अनाम अधिकारी ने संकेत दिया कि अब तक लावण्या के संरक्षण हेतु एकीकृत प्रबंधन योजना तैयार नहीं हुई है, और विभिन्न सरकारी निकायों के बीच समन्वय की कमी को मुख्य बाधा माना गया है। यह कथन नगर प्रशासन के ‘जागरूकता’ से अधिक ‘प्रोसेस’ की कमी को उजागर करता है, जैसा कि अक्सर ‘विकास’ की फाइलों में लिखा होता है।

विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि जल‑आश्रयों के पुनरुत्थान, पावर लाइनों के रूटिंग में बदलाव, और आवारा कुत्तों पर साक्ष्य‑आधारित नियंत्रण उपायों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। साथ ही, स्थानीय विद्यालयों और नागरिक समूहों को साक्षरता कार्यक्रमों के माध्यम से जागरूक करना आवश्यक है, ताकि लावण्या के भविष्य को लेकर सामुदायिक सहयोग सुनिश्चित हो सके।

जब तक नगरपालिका इस दिशा में ठोस कार्रवाई नहीं करती, लावण्या की घटती गिनती राजस्थान की पर्यावरणीय प्रतिबद्धता पर कलंक लगाते रहने की संभावना है। इस मुद्दे पर आशा का एक ही तरीका है – प्रशासनिक इच्छा को वास्तविक बजट और निरंतर निगरानी में बदलना।

Published: May 7, 2026