गोवा में रवायस नियंत्रण में बड़ी खामियाँ, एक‑तीहाई पालतू मालिकों का टिका‑बंद न होना
गोवा सरकार द्वारा चलाए जा रहे रवायस नियंत्रण कार्यक्रम में गंभीर अंतर दिख रहा है। एक संयुक्त सर्वेक्षण के अनुसार, पालतू पशु मालिकों में से लगभग 33 प्रतिशत ने अपने कुत्ते‑बिल्ली को उचित रूप से टिका नहीं करवाया, जबकि नसबंदी की दर भी अत्यधिक कम पाई गई। यह आंकड़ा स्थानीय प्रशासन की सतह नीचे की कमियों को स्पष्ट रूप से उजागर करता है।
सर्वे में यह भी सामने आया कि पशु चिकित्सकों की उपलब्धता सीमित है, विशेषकर ग्रामीण और औद्योगिक क्षेत्रों में। कई नागरिकों ने बताया कि निकटतम पशु अस्पताल तक पहुँचने में भौगोलिक दूरी, उच्च फीस और असंगत समय‑सारणी के कारण टिका‑कार्य करवाना कठिन हो जाता है। इन बुनियादी ढाँचे की गिरावट के कारण पालतू पशु रोग नियंत्रण में ‘मिलेट्री’ पहलें व्यर्थ प्रतीत होती हैं।
साथ ही, सामाजिक मिथकों और गलतफहमी ने भी समस्या को बढ़ा दिया है। कई घरों में यह विश्वास अभी भी बना हुआ है कि कुत्ते के काटने पर तुरंत अस्पताल नहीं जाना चाहिए, बल्कि ‘घर की जड़ी‑बूटी’ या ‘परम्परागत उपाय’ पर्याप्त हैं। इससे बाइट रिपोर्टिंग प्रणाली की कार्यक्षमता पर भी प्रश्न उठता है; अधिकांश मामलों में बाइट की सूचना न तो रुकी हुई है न ही उसका उचित उपचार हुआ है।
वर्तमान में रवायस रोग के कारण होने वाले मामलों में से अधिकांश को रोका जा सकता था, लेकिन प्रशासनिक उदासीनता और जन जागरूकता की कमी ने इसे एक सार्वजनिक स्वास्थ्य खतरे में बदल दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि बिना लक्ष्य‑निर्धारित टीकाकरण अभियान, सुलभ पशु स्वास्थ्य केंद्र और सक्रिय बाइट रिपोर्टिंग प्रणाली के, इस रोग को नियंत्रित करना असम्भव है।
स्थानीय सरकार को अब तत्काल ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है—जैसे कि टिका‑बंद और नसबंदी के लिए सब्सिडी प्रदान करना, मोबाइल पशु चिकित्सा इकाइयों का परिचालन, और मिथकों को तोड़ने के लिए विज्ञान‑आधारित जनसंचार अभियान। अन्यथा, आगामी महीनों में रवायस‑संबंधी मौतों की संख्या बढ़ती रहेगी, जिससे प्रशासन को सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में जवाबदेह ठहराया जायेगा।
Published: May 4, 2026