ग्रेटर नोएडा ने हापुर से गंगा एक्सप्रेसवे लिंक को मंजूरी दी, FY 2026‑27 में 6,048 करोड़ बजट
उत्तरी भारत के प्रमुख औद्योगिक केंद्र ग्रेटर नोएडा ने 2 मई को अपने अधिकार क्षेत्र में गंगा एक्सप्रेसवे को हापुर से जोड़ने के लिये विस्तृत योजना को स्वीकृति दी। इस योजना के लिये वित्तीय वर्ष 2026‑27 में कुल 6,048 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया गया, जिससे न केवल परिवहन ढांचा सुधरेगा, बल्कि क्षेत्रीय आर्थिक गतिशीलता भी तेज होगी।
परिचालन को दो मुख्य चरणों में बाँटा गया है: पहला, लगभग 55 किलोमीटर का नई राजमार्ग निर्माण, जिसमें कई मौजूदा गाँव‑दृष्टिकोण में भूमि अधिग्रहण, जल निकासी और पर्यावरणीय शमन कार्य शामिल हैं। दूसरा, आपातकालीन सेवाओं को सुदृढ़ करने हेतु 102‑मीटर पहुँच वाला हाई‑रीच क्रेन भारतीय अग्निशमन विभाग को प्रदान किया जाएगा, जिससे बड़े‑पैमाने के आग‑जला और दुर्घटना प्रबंधन में मदद मिलेगी।
पिछले कुछ वर्षों में ग्रेटर नोएडा ने कई हाई‑स्टैन्डर्ड बुलेवार्ड और विशेष आर्थिक ज़ोन स्थापित किए हैं, परंतु यह योजना नगर निकाय के प्राथमिकता संकेतक में शीर्ष पर आती है। प्रशासन ने इस पहल को “आर्थिक एंजल” कहा, क्योंकि इस ले‑फे‑रेट मार्ग से वाराणसी‑नोएडा‑दिल्ली अंतर्राष्ट्रीय व्यापार corridors को अतिरिक्त गति मिलने की आशा है। अनुमानित रूप में यात्रा समय 40 % घटेगा और लजिस्टिक लागत में समान अंतराल आएगा।
हालाँकि, इस पर धनी‑भारी प्रतिवाद भी उठ रहा है। कई स्थानीय ग्रामों के प्रतिनिधि भूमि अधिग्रहण के पारदर्शिता और पुनर्वास पैकेज को लेकर असंतुष्ट हैं, जबकि पर्यावरण विशेषज्ञों ने नई सड़कों के कारण वन‑कट और जल स्रोतों के क्षरण पर सवाल उठाया है। 6,048 करोड़ की खर्चीली परियोजना पर वित्तीय अनुशासन के अभाव के डर से कुछ नागरिक यह भी पूछ रहे हैं कि ठीक-ठीक कब तक जलापूर्ति, बुनियादी सड़क इलाकों और कचरा प्रबंधन जैसे मौजूदा समस्याओं का समाधान होगा।
उपस्थिति में ग्रेटर नोएडा प्रबंधन ने कहा कि न केवल आर्थिक लाभ प्रमुख है, बल्कि “सुरक्षा‑इन्फ्रास्ट्रक्चर” को आधुनिक बनाकर भविष्य की आपदाओं के लिये तैयार किया जा रहा है। उसकी टिप्पणी में एक नियोजित “ड्राई‑डिस्पेंस” सिस्टम तथा डिजिटल ट्रैकिंग के माध्यम से परियोजना की प्रगति को “रियल‑टाइम” में जनता को दिखाने की योजना भी शामिल है।
वास्तविकता यह है कि बड़े‑पैमाने के राजमार्ग अक्सर स्थानीय प्रशासन की “बीवीआर वॉटर” जैसी समस्याओं को पृष्ठभूमि में धकेल देते हैं। इस लेख का उद्देश्य यह उजागर करना है कि ग्रेटर नोएडा की इस महँगी लिंक योजना में हाई‑राइट के साथ साथ नीचले‑स्तर की बुनियादी सुविधाओं की अनदेखी भी हो रही है—जैसे सड़क की पक्की सतह के पीछे पानी के टैंकों की लीक या नाली में कचरे का जाम। अंत में कहा जा सकता है कि अगर इस 102 m क्रेन से आग‑जला में भी “धुंधला” नहीं हो गया, तो शायद इस परियोजना की लागत‑और‑समय‑सीमा को फिर से पढ़ना पड़ेगा।
Published: May 5, 2026