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गुड़गाँव‑फरीदाबाद में जज‑वकील टक्कर के बाद वकीलों ने हड़ताल की घोषणा
गुड़गाँव‑फरीदाबाद न्यायिक क्षेत्र में 8 मई को उत्पन्न विवाद ने स्थानीय न्यायालयों को बलगद बना दिया। दो विस्तृत सत्र अदालतों के सीनियर वकील संघ ने, एक वरिष्ठ न्यायाधीश के खिलाफ अनुचित और निरंकुश आदेशों का आरोप लगाते हुए, 24 घंटे की हड़ताल का ऐलान किया।
वकीलों का कहना है कि न्यायालय के मुख्य जज ने बिना कारण कई अधिसूचनाओं को निरस्त कर दिया, वकीलों को “अवसरहीन” कहा और कुछ फ़ाइलें “अनुशंसित नहीं” घोषित कर दीं। इसके अलावा, संघ के प्रतिनिधियों पर व्यक्तिगत धमकी, अपमानजनक भाषा और कार्यस्थल में प्रतिकूलता का भी आरोप लगाया गया। उक्त आरोपों के जवाब में जज ने कहा कि उन्होंने केवल न्यायिक प्रक्रिया की अनिवार्यताओं को लागू किया है और इस दौरान उन्हें “भयावह धमकी और शारीरिक उत्पीड़न” का सामना करना पड़ा।
विधिक संघ ने हड़ताल की घोषणा के साथ यह भी कहा कि यदि न्यायाधीश के आदेशों की समीक्षा नहीं होती, तो वे अगली कार्यदिवस में “पूरा न्यायिक संचालन रोके जाने” का विकल्प अपनाएंगे। इससे न केवल अनसुलझे मुकदमों में देरी होगी, बल्कि सामान्य नागरिकों, व्यवसायियों और सरकारी विभागों को भी प्रत्यक्ष प्रभावित हो सकता है।
राज्य के विधि विभाग ने तुरंत हस्तक्षेप करते हुए, जिला प्रशासन को सलाह दी कि वह दोनों पक्षों के बीच संवाद को सुदृढ़ करे। पुलिस को भी इस “स्थानीय सार्वजनिक व्यवस्था” को बनाए रखने के लिए अतिरिक्त गश्त तैनात करने का निर्देश दिया गया। प्रशासन ने कहा, “हम सभी संबंधित पक्षों को एक सुस्पष्ट, पारदर्शी और भरोसेमंद समाधान की दिशा में काम करने का आग्रह करते हैं; न्यायालय की कार्यवाही को बाधित करना कोई विकल्प नहीं होना चाहिए।”
वकील समुदाय के भीतर इस मुद्दे को लेकर हल्की‑फुल्की टिप्पणी भी उभरी है: “अब लगता है कि न्यायालय के बाहर भी ‘बेंच‑वचन’ अधिक फेरे लगेगा।” यह सूखा व्यंग्य, न्यायालय के भीतर बढ़ती त्रुटियों को उजागर करने का एक सूक्ष्म तरीका बन गया है।
वर्तमान में, दोनों शहरों में अधिकांश न्यायालयीन प्रक्रियाएँ स्थगित हो गई हैं और आगे के विकास की संभावनाएँ प्रशासनिक मध्यस्थता पर निर्भर करती दिख रही हैं। यदि विवाद का समाधान शीघ्र नहीं होता, तो इससे न केवल न्यायिक बकाया बढ़ेगा बल्कि प्रणाली के प्रति सार्वजनिक विश्वास में भी गिरावट आ सकती है।
Published: May 9, 2026