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गुजरात में दुर्लभ पक्षी की चूज़ी की मौत से जुड़ी बचाव योजना पर नया जोर

गुजरात के सूरत जिले के जैनप्रेम वन्यजीव अभ्यारण्य में पिछले दो हफ्तों में एक दुर्लभ क्विक्स-इंडियन बर्ड (GIB) की चूज़ी की आकस्मिक मृत्यु की पुष्टि हुई। मृत्यु, जो एक हीट-डाउन और अपर्याप्त पोषण कारणों से हुई, ने राज्य में पहले से ही तैयार की गई पक्षी प्रजनन योजना को फिर से सामने ला दिया।

विषय पर तत्काल कार्रवाई करते हुए, वन्यजीव विभाग ने मौजूदा प्रजनन केंद्र को विस्तारित करने और नई सुविधाओं को स्थापित करने का प्रस्ताव रखा। इस प्रस्ताव में 2027 तक पाँच नई इनडोर एंकेटर, तापमान नियंत्रण प्रणाली और 24‑घंटे निगरानी के लिए डिजिटल कैमरा स्थापित करने का उल्लेख है। विभाग के आरक्षित अधिकारी संजय मेहता ने कहा, “हमारी योजना का उद्देश्य केवल इस प्रजाति को बचाना ही नहीं, बल्कि स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखना भी है, लेकिन चूज़ी की मृत्यु ने हमें याद दिलाया कि सिद्धांत और अभ्यास में अभी भी एक बड़ा अंतर है।”

राज्य सरकार ने इस पर ध्यान देते हुए वन्यजीव संरक्षण निधि में अतिरिक्त ₹२ करोड़ आवंटित किए हैं। साथ ही, सरपटोपावन में स्थित सौरजिला अभ्यान के प्रमुख ने कहा, “बिल्कुल, यह समस्या हमने कई बार निकाली है—पर्यावरणीय नीति में कागज पर बहुत कुछ लिखा है, लेकिन जमीन पर लागू करने की गति अक्सर ‘ट्रैफिक जाम’ जैसी रहती है।”

स्थानीय NGOs और पक्षी प्रेमियों ने भी इस घटना पर अपनी आवाज़ उठाई। गुजरात पर्सनल बर्ड सोसाइटी (GPBS) की अध्यक्ष रीना सैनी ने कहा, “एक चूज़ी की मौत को लेकर जनसत्ता को जागरूक करना मुश्किल है, पर इस मौके को प्रयोगशाला से बाहर ले जाकर आम जनता को भी पक्षी संरक्षण के महत्व से परिचित कराना आवश्यक है।” उन्होंने यह भी कहा कि अभ्यारण्य के आसपास की सड़कों के कंक्रीट कवरेज को कम करके प्राकृतिक आवास पुनर्स्थापित करने की भी आवश्यकता है।

ब्यूरोक्रेसी की धीमी गति और योजनाबद्ध कार्यान्वयन में देरी की जुदाई अब भी स्पष्ट है। आलोचक कहते हैं कि “नीति का लोहा तब तक नहीं चमक सकता जब तक उसे जमीन पर उतारने वाले अधिकारियों को भी ठीक से नहीं समझाया जाए कि कब ‘सरसों का दाणा’ नहीं, ‘हाथ से पकड़े हुए पंख’ भीसते रहेंगे।”

फिर भी, इस त्रासदी ने प्रशासनिक एकजुटता को फिर से सक्रिय किया है। अगले सप्ताह में राज्य स्तर की एक कार्यशाला आयोजित होगी, जिसमें वन्यजीव विभाग, स्थानीय प्रशासन, NGOs और वैज्ञानिकों को आमंत्रित किया जाएगा, ताकि इस प्रजाति के लिए दीर्घकालिक प्रजनन एवं पुनरुपायन रणनीति तैयार की जा सके।

Published: May 6, 2026