जो होना ही था, उसे दर्ज करता, देखता और सवाल करता समाचार मंच

Category: शहर

कोलकाता के पार्क स्ट्रीट बॉलून व्यापारी ने ICSE पास कर शिक्षा‑रोज़गार संतुलन पर बहस छेड़ी

कोलकाता के प्रतिष्ठित पार्क स्ट्रीट पर एक छोटी सी स्टॉल से बॉलून बेचती 24 वर्षीया नेहां खातून ने हाल ही में ICSE परीक्षा में 45% अंक हासिल करके सार्वजनिक परीक्षा पास करने का मुकाम हासिल किया। यह उपलब्धि न केवल उसकी व्यक्तिगत दृढ़ता को दर्शाती है, बल्कि शहर में शहरी गरीब वर्ग के बच्चों को शिक्षा और आय के बीच किए जाने वाले कठिन चयन की झलक भी पेश करती है।

नेहां की कहानी इस बात की मार्मिक याद दिलाती है कि कई बच्चों के लिए शिक्षा केवल एक अधिकार नहीं, बल्कि जीविकोपार्जन का एक विकल्प बन जाता है। पारिवारिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये उसने स्कूल के समय के बाद और कभी‑कभी सप्ताहांत में ही बॉलून बेचे, जिससे अध्ययन का समय निरंतर घटता गया। यह दोहरी जिम्मेदारी नॉर्थ एशिया के बड़े शहरी क्षेत्रों में आम है, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर इस समस्या को कम करने के लिये ठोस उपायों की कमी स्पष्ट है।

कोलकाता नगर निगम (केएनएमसी) ने पिछले कई वर्षों में शिक्षा‑सहायता कार्यक्रमों की घोषणा की है, परंतु बुनियादी ढांचा, अभिभावक सहायता तथा कल्याणकारी योजनाओं की वास्तविक पहुँच अक्सर सड़कों के कोनों पर काम कर रहे छोटे व्यापारियों तक नहीं पहुँच पाती। नेहां के मामले में, वह राज्य द्वारा प्रदान किए जाने वाले शैक्षणिक रियायतों से अनभिज्ञ रही, जबकि कई समान परिस्थितियों वाले बच्चों को इस जानकारी की कमी के कारण लाभ नहीं मिलता। यह संकेत देता है कि सूचना प्रसार और लक्ष्यित सहायता के बीच अंतराल को पाटना प्रशासन की तत्काल प्राथमिकता होनी चाहिए।

नेहां की सफलता के पीछे न केवल उसकी मेहनत, बल्कि उसके परिवार का सहयोग भी रहा—कहते हैं कि यदि वह विक्रेता काम बंद कर दे, तो उसके पढ़ने का कोई रास्ता नहीं बचता। इस प्रकार का सामाजिक दबाव अक्सर गरीब परिवारों में शिक्षा के प्रति उत्साह को मार देता है, लेकिन नेहां ने साबित किया कि संघर्ष के बाद भी उम्मीद का दिया जलाया जा सकता है।

स्थानीय प्रशासन को इस कहानी से कई निष्कर्ष निकालने चाहिए: प्रथम, शहर के उन क्षेत्रों में जहाँ अनौपचारिक अर्थव्यवस्था व्याप्त है, वहाँ स्कूली बच्चों के लिये विशेष शैक्षिक टाइम‑टेबल या नाइट क्लासेस की व्यवस्था अनिवार्य होनी चाहिए। द्वितीय, छोटे व्यवसायियों को आय के अलावा सामाजिक सुरक्षा कवरेज प्रदान करने के लिये नगर स्तर पर नवीनीकृत कार्य योजना आवश्यक है। अंत में, शहरी शैक्षणिक संस्थानों को निचली आय वर्ग की छात्राओं के लिये प्रवेश में लचीलापन और आर्थिक सहायता के स्पष्ट मार्ग दिखाने चाहिए, न कि केवल औपचारिक पात्रता के अंक‑आंकड़ों पर निर्भर।

नेहां खातून की कहानी अब एक प्रेरणादायक किस्सा नहीं रह गई; यह कोलकाता के शहरी विकास की उन सीमाओं को उजागर करती है जहाँ आर्थिक जीवित रहने की लड़ाई शिक्षा के सपनों के साथ टकराती है। यदि नगर प्रशासन इस संकेत को नज़रअंदाज़ करता रहेगा, तो बॉलून बेचने वाले कई और छात्र अपने उज्जवल भविष्य को आजीविका की तड़प में खो देते रहेंगे।

Published: May 4, 2026