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कोलकाता के नए विधायकों में 65% आपराधिक मामलों के साथ 61% करोड़पति

बीते महीने हुई विधानसभा चुनावों के परिणामों ने एक असहज सच सामने रख दिया: 206वीं विधान सभा के 152 चुने हुए विधायक (74%) के खिलाफ आपराधिक मामलों का दर्जा है, जबकि 80 में से 34 (43%) विधायक पर वही लंगर लटका है। दोनों दलों के बीच यह अंतर स्पष्ट है, परंतु पारस्परिक तुलना से अधिक महत्वपूर्ण है नागरिकों की वेधशाला में प्रतिबिंबित दोहरी अँधेरा – आपराधिक रिकॉर्ड और करोड़पति की संपत्ति दोनों का एक साथ मौजूद होना।

बिहार की राजधानी नहीं, कोलकाता में इस बिंदु को लेकर राजनीतिक दलों ने अपने-अपने लाभ के अनुसार आंकड़ों को प्रस्तुत किया। भाजपा ने 74% मामलों को ‘सामान्य’ कहा, जबकि ट्रिनामूल कांग्रेस ने 43% को ‘सिर्फ आरोप’ बताकर अपने उम्मीदवारों को साफ‑सुथरा चित्रित करने की कोशिश की। वास्तविकता यह है कि चुनावी घोषणा के समय वादी‑प्रतिवादी दोनों को ‘स्वीकृति’ मिलती है, जिससे जनता के लिए अंतर पहचानना कठिन हो जाता है।

इस परिनाम का असर न सिर्फ क़ानून व्यवस्था के प्रति भरोसा घटाने में बल्कि प्रशासनिक कार्यवाही के विश्वास को भी डगमगा देता है। जब विधायी कक्ष में अधिकांश सदस्य स्वयं ही न्यायालय की ही बेड़ी में बँधे होते हैं, तो पारदर्शी सरकारी नीतियों की कल्पना करना कठिन हो जाता है। साहित्य में अक्सर कहा गया है – ‘सत्ता का संगम जहाँ न्याय के साथ हो, वहीं विकास की राह खुलती है’; परंतु यहाँ दोनों के बीच का अंतराल बढ़ता दिख रहा है।

आर्थिक पक्ष के आंकड़े भी उत्तेजक हैं। 61% विधायक ‘करोड़पति’ के रूप में घोषित हैं, जिसका अर्थ है कि उनका व्यक्तिगत संपत्ति एक करोड़ रुपये से अधिक है। यह तथ्य दर्शाता है कि राजनीति में आर्थिक शक्ति तकलीफ़ नहीं, बल्कि प्रतिस्पर्धा का एक नया रूप बन गई है। वहीं आम नागरिक, जो रोज़मर्रा की समस्याओं – जल आपूर्ति, कचरे का प्रबंधन और स्वास्थ्य सुविधाओं – से जूझते हैं, उन्हें ऐसा प्रतीत हो सकता है कि सत्ता का मंच केवल संपन्न वर्ग के लिए सजाया गया है।

वर्तमान में चुनाव आयोग ने ‘पारदर्शी चयन’ के लिए सख्त आँकड़े पेश करने की घोषणा की है, परंतु इस दिशा में ठोस कदम अभी तक नहीं दिखे। रोकथाम के रूप में आपराधिक मामलों के वर्जन या सम्पत्ति सीमा की समीक्षा की मांग करने वाले नागरिक समूहों ने कहा है कि ‘सूचना का अधिकार’ केवल कागज पर नहीं, बल्कि चुनावी प्रक्रिया में भी लागू हो।

निष्कर्षतः, कोलकाटा के नव‑विधायकों में बढ़ता आपराधिक बोज़ और संपत्ति का दोहरा आँकड़ा स्थानीय प्रशासन की जवाबदेही को चुनौती देता है। लोकतंत्र की सच्ची भावना तभी जीवित रह सकती है जब मतदाता केवल वोट नहीं, बल्कि उम्मीदवार की पृष्ठभूमि की जाँच को भी प्राथमिकता दें। समय आ गया है कि नागरिकों, प्रशासन और न्यायिक संस्थाओं के बीच एक स्थायी संवाद स्थापित हो, जिससे “कानून सबका, विकास सबका” का सिद्धांत वास्तविकता बन सके।

Published: May 7, 2026