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केंद्री सरकार की गैस सिलेंडर कीमत बढ़ाने और रेलवे नौकरियों में कटौती पर सीपीआई(एम), सीपीआई, वीसीके का विरोध

नई दिल्ली—वित्त मंत्रालय द्वारा इस सप्ताह कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की कीमत में 7.5 प्रतिशत की वृद्धि की घोषणा की गई, साथ ही भारतीय रेलवे में 29,000 पदों को हटाने का प्रस्ताव पेश किया गया। इस पर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) (CPI(M)), कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) और वैक कम्पनियन (VCK) ने सामूहिक रूप से तीखी आलोचना की।

केंद्री सरकार का कहना है कि सिडिलर मूल्य‑वृद्धि का आधार अंतरराष्ट्रीय पेट्रोलियम कीमतों में लगातार उतार‑चढ़ाव और सब्सिडी नीति में परिवर्तन है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, पिछले महीने के अंत में एक कमर्शियल 14.2 किग्रा सिलेंडर की औसत कीमत रु. 650 थी, जिसे नई दर रु. 700 तक ले जाया गया है। इस कदम को “बाजार‑अनुकूल” बताया गया, जबकि कई छोटे व्यवसायी अपने उत्पादन खर्च को बढ़ते देख रहे हैं।

विरोधी दलों ने इस निर्णय को “वित्तीय असंवेदनशीलता” और “असमान बोझ” कहकर खारिज किया। CPI(M) के प्रवक्ता ने कहा, “जब सरकार ने महँगाई को ‘जोखिम’ कहा, तो उसने अपने ही परिधान में छेद क्यों नहीं किया?” CPI ने इस बात पर ज़ोर दिया कि गैस सिलेंडर की कीमत में वृद्धि से छोटे उद्यमियों की मार्जिन में गिरावट आएगी, जिससे रोजगार सृजन की सरकारी प्रतिबद्धता पर सवाल उठेंगे। VCK ने विशेष रूप से दक्षिण भारत के व्यावसायिक वर्ग को बताया कि “सिलेंडर महंगे होते हैं तो छोटे मंडी वाले ठेले वाले और अधिक कंगाल हो जाएंगे”।

रेलवे में 29,000 नौकरियों को घटाने की योजना का उद्देश्य “संसाधन पुनर्संरचना और निजीकरण की गति तेज करना” बताया गया है। वित्त विभाग के एक आधिकारिक दस्तावेज़ में उल्लेख है कि वर्तमान में भारतीय रेलवे के कुल पद 1.3 लाख है, और प्रस्तावित कटौती से संचालन लागत में 12 प्रतिशत की कमी की उम्मीद है। हालांकि, रेलवे कर्मचारियों का संघ इस फैसले को “भवनात्मक अंधाधुंध” का उदाहरण कह रहा है। उन्होंने कहा कि इससे न केवल रोजगार का नुकसान होगा, बल्कि शौसैनिक एवं सोशल सेवाओं में भी बाधा आएगी, जिससे दैनिक यात्रियों पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।

कुशल कार्यकर्ता और सामाजिक संगठनों ने इस पर “सरकारी नीतियों का ‘वित्तीय मॉड्यूलर’ बनाने का बहाना वही पुराना ‘कटौती‑कटौती’ है” कह कर आलोचना की। उन्होंने यह भी कहा कि यदि सरकार रोजगार को ‘औपचारिक’ बनाकर बढ़ाने की शुरुआत नहीं करती, तो इस तरह के नाममात्र “सुधार” केवल आँकड़ात्मक जीत रहेंगे।

भविष्य में क्या होगा, इस पर अटकलें लगाई जा रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार व्यावसायिक वर्ग को राहत नहीं देती, तो असंतोष और सामाजिक आंदोलन की लहर उठेगी। वहीं, रेलवे नौकरी कटौती के खिलाफ ट्रेड यूनियन की धक्का‑धक्का के कारण सरकार को सामाजिक स्थिरता को ध्यान में रखते हुए पुनर्विचार करना पड़ सकता है।

एक तरफ जहाँ आर्थिक संतुलन और बजट सुदृढ़ीकरण की बात की जा रही है, वहीँ दूसरी ओर कई वर्गों को उधार लेने के लिए ‘भुगतान‑शून्य’ स्त्रोत जैसा महसूस हो रहा है। इस बीच, जनता को इन नीतियों के वास्तविक प्रभाव का सामना करना पड़ेगा, चाहे वह महँगी गैस सिलेंडर की बोतल हो या अनिश्चित भविष्य की नौकरी।

Published: May 7, 2026