विज्ञापन
पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय, चंडीगढ़ में वकील की आवश्यकता है?
आपराधिक मुकदमों, जमानत, गिरफ्तारी, एफआईआर, जांच और उच्च न्यायालयी कार्यवाही से जुड़े कानूनी मार्गदर्शन के लिए यहां क्लिक करें।
केंद्र और बिहार ने निवेश‑परिस्थिति सुधार हेतु नियमन समीक्षा की
पटना में केंद्रीय बुनियादी ढांचा मंत्री और बिहार के उद्योग एवं व्यापार विभाग के प्रमुख ने आज एक बैठक में नियमन‑सुधार की स्थिति का सर्वेक्षण किया। इस चर्चा का मुख्य उद्देश्य राज्यों में निवेश के माहौल को सुदृढ़ करना, व्यापार प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाना और नागरिक‑उद्यमी दोनों के लिये आसान बनाना था।
बैठक में प्रस्तुत किए गए प्रमुख बिंदु थे: अनुमोदन प्रक्रियाओं की संख्या घटाना, एक ही विंडो में सभी आंतरिक मंजूरी देना, भूमि अधिग्रहण की तेज़ी, और कर‑नियमों का सरलीकरण। केंद्र के प्रतिनिधि ने कहा कि “बिहार के विकास को गति देने के लिये नियामक बोझ को घटाना अनिवार्य है, अन्यथा निवेशक ‘स्क्रूटनी’ में फंसे रहेंगे।”
बिहार सरकार ने अब तक के कदमों का सारांश दिया – फाइनेंस कैलेंडर के तहत ‘ई‑अप्लिकेशन’ पोर्टल का विस्तार, उद्योग बोर्ड में निजी सेक्टर प्रतिनिधियों की भागीदारी, तथा छोटे‑उद्यमियों के लिये ‘नो‑ऑब्जेक्टिव’ टॅक्स रेट की घोषणा। ये सब घोषणाएँ स्थानीय व्यापारियों के लिये एक ताज़ा हवा का संकेत देती हैं, परंतु पिछले कई बार ऐसी पहलें सिर्फ कागजी कार्रवाई में ही ठहर गईं, जिससे जमीन‑से‑हाथ‑पहल का अभाव रहा।
स्थानीय नगर परिषदों पर भी यह जिम्मेदारी सौपी गई है कि वे नई नीतियों को अपने परिप्रेक्ष्य में लागू करें। पटना नगर निगम के सचिव ने कहा कि “जब तक हमें स्पष्ट दिशा‑निर्देश और तकनीकी समर्थन नहीं मिलता, तब तक ‘एक ही विंडो’ का सिद्धांत सिर्फ नाम ही रहेगा।” इस पर कुछ नगर अधिकारियों ने संकेत दिया कि आधुनिकीकरण के लिये बजट आवंटन में देरी और आईटी कर्मियों की कमी अभी भी बाधा है।
नागरिकों के दृष्टिकोण से बात करें तो छोटे व्यापारियों ने इस सुधार को “व्यापार‑संधी के लिये सच्चा वरदान” कहा, जबकि कुछ उपभोक्ताओं ने “ब्यूरोक्रेसी के घुड़सवारी में अब भी कूद रहा है” जैसा टिप्पणी किया, जो इस बात की ओर इशारा करता है कि नियमन सुविधा तभी सिद्ध होगी जब उसके कार्यान्वयन में भी तत्परता दिखे।
विचारों की विविधता के बीच एक स्पष्ट संकेत मिलता है: नियमन में ढील तो आवश्यक है, परंतु उसका साकार रूप कभी‑कभी ‘क्रेडिट‑साइन’ से पहले ही ‘जाम‑साइन’ बन जाता है। यदि केंद्र और राज्य के बीच की समीक्षा को ठोस कार्य‑योजना और निगरानी तंत्र के साथ नहीं जोड़ा गया, तो इस बार की ‘सुधार’ की कहानी भी पिछले कई ‘विशाल‑विचार‑मंचों’ की तरह ही कागज़ी अभिलेख बन कर रह सकती है।
Published: May 9, 2026