केजीएमयू के नेत्र विभाग में पाई गई कदाचार की रिपोर्ट ने प्रशासन को चुनौती दी
लखनऊ – किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) के नेत्र विभाग में किनारे-किनारे की बारीकियों को नज़रअंदाज़ कर दिया गया था, ऐसा एक समिति के निष्कर्षों में स्पष्ट हुआ है। राज्य स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग ने नियत समय पर बनाई गई जांच पैनल ने 45 दिन की विस्तृत जाँच के बाद कई कठोर तथ्यों को सामने रखा, जिसमें अनधिकृत शल्यक्रियाएँ, रोगी रिकॉर्ड में हेरफेर और सस्ते उपकरणों के उपयोग से रोगियों को संभावित जोखिम की सृष्टि शामिल है।
पैनल में राष्ट्रीय स्तर के नेत्र विशेषज्ञ, चिकित्सा कानूनी और एक वित्तीय नियंत्रक शामिल थे। उन्होंने बताया कि विभाग में फिजियोथेरेपी से जुड़े साधनों को गिरवी रखकर निजी क्लिनिक में बदल दिया गया, जिससे सरकारी फंड का दुरुपयोग हुआ। इसके अतिरिक्त, 18 मामलों में ऐसा पाया गया कि ऑपरेटिंग रूम में आवश्यक स्वच्छता मानकों का उल्लंघन हुआ था, जबकि रोगी फाइलों में “सफाई पूर्ण” की झूठी टिप्पणी दर्ज की गई थी।
पैनल के प्रमुख ने कहा, “हम जिस ‘नेत्र’ की बात कर रहे हैं, वह केवल रोगी की दृष्टि नहीं, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता की रोशनी भी है। इस रोशनी में अब तक के अंधेरे को साफ़ करने की जरूरत है।” इस वक्तव्य में एक सूखे व्यंग्य के साथ प्रशासन की ‘देखभाल’ पर सवाल उठाया गया।
केजीएमयू के निदेशक एवं नेत्र विभाग प्रमुख को तत्काल निलंबित कर दिया गया है, और विभाग के 12 वरिष्ठ डॉक्टरों को “कार्य से अस्थायी रूप से मुक्त” किया गया है। राज्य सरकार ने उल्लेख किया कि आगामी दो हफ्तों में एक स्वतंत्र ‘जाँच दल’ को नियुक्त किया जाएगा, जो मौजूदा पैनल की रिपोर्ट को पुनः सत्यापित कर निष्कर्षों के आधार पर सजा-प्रक्रिया तय करेगा। इस दौरान, विभाग की सभी शल्यक्रियाओं को रोक दिया गया है और रोगियों को वैकल्पिक सरकारी अस्पतालों में रेफर किया जा रहा है।
रोगियों की ओर से आक्रोश गूँज रहा है। कई रोगियों के परिवार ने कहा कि उन्होंने महँगे इलाज की आशा में सरकारी अस्पताल का चयन किया था, पर अब उन्हें निजी क्लिनिक में उपचार लेना पड़ेगा, जिससे आर्थिक बोझ बढ़ रहा है। रोगी संगठनों ने सुरक्षा मानकों की कड़ाई से पालन करने की मांग की है और “डॉक्टरों का लाइसेंस नहीं, बल्कि सार्वजनिक विश्वास ही यहाँ की असली पूंजी है” कह कर प्रशासन को जवाबदेह ठहराया है।
पैनल ने प्रशासन को कई सिफारिशें भी दी हैं: प्रथम, सभी रोगी रिकॉर्ड को पुनः सत्यापित कर डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म में एकीकृत करना; द्वितीय, विभाग में उपयोग हो रहे सभी उपकरणों की सुरक्षा प्रमाणपत्रों की जांच; तृतीय, एक स्वतंत्र नियामक संस्था की स्थापना जो वार्षिक ऑडिट कर सके। यदि इन अनुशंसाओं को लागू नहीं किया गया तो भविष्य में “अन्य विभागों में भी ऐसी ही ‘नीली आँखों’ वाली स्थितियों” की संभावना को प्रशासन ने स्वीकार किया है।
स्थानीय प्रशासन ने कहा, “सरकारी संस्थानों में कभी-कभी धुंधले परदे होते हैं, पर जनता की आवाज़ उन्हें साफ़ कर देती है। हम इस कदाचार को समाप्त करने के लिए ठोस कदम उठाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।” इस घोषणा में आशा और सतर्कता का मिश्रण दिखता है – एक ऐसी उम्मीद जो अभूतपूर्व निगरानी के बिना केवल कागज़ी शब्द बन कर रह सकती है।
Published: May 6, 2026