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उड़ीसा हाईकोर्ट ने नाबालिग गर्भपात मामले की सुनवाई में टालामटोल किया

ओडिशा के हाईकोर्ट ने 31 हफ्ते की गर्भावस्था में एक नाबालिग लड़की के गर्भपात अनुरोध पर अपना निर्णय टाल दिया है। एआईआईएमएस गठित मेडिकल बोर्ड ने माँ‑बच्चे दोनों के स्वास्थ्य पर गंभीर जोखिमों की ओर इशारा किया और गर्भावस्था को पूर्ण एंटेनेटल केयर के साथ जारी रखने की सलाह दी।

यह मामला पहले कई सामाजिक‑स्वास्थ्य संगठनों और कानूनी मंचों में चर्चा का बिंदु रहा, जहाँ दोधारी तर्क उभरे – नाबालिग की स्वास्थ्य‑सुरक्षा बनाम गर्भपात के कानूनी अधिकार। कोर्ट ने अब माता‑पिता की अगली निर्देशात्मक सुनवाई के लिए गुरुवार को पुनः विचाराधीन रखा है।

सामयिक प्रशासनिक दृष्टिकोण से यह देरी एक दोहरी समस्या पेश करती है। एक ओर, स्वास्थ्य बोर्ड की वैज्ञानिक सिफारिशें नियमों के साथ तालमेल बिठाने में समय लेती हैं; दूसरी ओर, न्यायिक व्यवस्था में सुनवाई की कुशलता पर सवाल उठता है। इस प्रकार, न्यायिक प्रबंधन में ‘समय‑सीमा’ शब्द के साथ थोड़ा अधिक ‘विचार‑विलंब’ जुड़ गया है।

स्थानीय प्रजासत्ताक और स्वास्थ्य विभाग के लिए यह स्थिति एक चेतावनी है: जब स्वास्थ्य‑केंद्रित निर्णय अचानक कानूनी जटिलताओं में फँसते हैं, तो नाबालिग की शारीरिक और मनोवैज्ञानिक स्थिति पर असर पड़ता है। अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि आगे की कार्रवाई में किस प्रकार की अतिरिक्त सामाजिक‑स्वास्थ्य समर्थन प्रणालियाँ सक्रिय होंगी।

भविष्य में इस तरह के मामलों के समाधान के लिए, स्वास्थ्य बोर्ड, न्यायालय और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच निरंतर संवाद और त्वरित निर्णय‑प्रक्रिया स्थापित करना आवश्यक दिखता है। तब ही न्यायालयिक प्रणाली का सम्मान और नाबालिगों का अधिकार दोनों सुरक्षित रहेंगे।

Published: May 7, 2026