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इंदिरापुरम में ‘हरी’ परियोजना, सड़कों की बिखरी सच्चाई
उच्च विकासवादी मापदंडों को उजागर करने के लिए लाए गये ‘ग्रीन रोड’ प्रोजेक्ट को अब तक केवल पाँच प्रतिशत ही जमीन पर देखा गया है। उत्तर प्रदेश के नगर निगम ने तीन महीने पहले इंदिरापुरम में पर्यावरण‑अनुकूल कंक्रीट, ट्री‑लाइनिंग और बायो‑ड्रेन ऐतिहासिक रूप से स्थापित करने का वादा किया था; पर वास्तविकता का नक्शा कुछ वैसा नहीं दिखाता।
प्रमुख कारणों में अनुबंधदाता की अति‑आलोचना, सामग्री की प्रोसेसिंग में देरी और समय‑समय पर बदलते हुए कार्य‑आदेश शामिल हैं। नगरपालिका के अधिकारियों ने बताया कि कई बार योजना‑पुस्तक में बदलाव के कारण कार्य‑स्थल पर पुन: नियोजन करना पड़ा, जिससे प्रारम्भिक लक्ष्य से बहुत दूर होकर अब तक केवल पाँच प्रतिशत कार्य ही पूरा हो पाया है। यह वो आंकड़ा है, जबबी से शहर के निवासी जमीनी स्तर पर होते हुए हमेशा की तरह गड्ढे‑भरी सड़कों पर अधिक समय बिता रहे हैं।
नागरिकों ने बताया कि रोज़मर्रा की आवागमन अब भी धूल‑भरी, असमान सतहों और अचानक उभरे हुए गड्ढों से भरी हुई है। कई मामलों में वाहन क्षति और दुर्घटनाओं की रिपोर्ट पुलिस को मिली है, जबकि स्थानीय प्रतिनिधियों ने यह आश्वासन दिया है कि ग्रीन प्रोजेक्ट के तहत ‘सुरक्षित यात्रा’ का वादे को पूरी तरह साकार किया जाएगा।
वास्तविकता यह है कि ‘हरे‑हरे’ साइडवॉक पर औद्योगिक धूल की बूंदें, और हर सुबह की तरह मोटर‑ट्रैफ़िक की संख्या में गिरावट को लेकर नहीं, बल्कि बिखरे हुए गड्ढों की संख्या में वृद्धि को लेकर नागरिकों की शर्तें तय हो रही हैं। प्रशासन ने इस सप्ताह पुनः योजना बनाने और कार्य की गति बढ़ाने के लिए एक विशेष निरीक्षण टीम बनाने का ऐलान किया, पर स्पष्ट समय‑सीमा नहीं दी गई।
विचार‑विमर्श यह दर्शाता है कि बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं में ‘हरित’ शब्द का इस्तेमाल केवल प्रचार‑उपकरण बन जाता है, जब तक कि प्रौद्योगिकीय और प्रशासनिक सहयोग वास्तविक रूप से लागू न हो। इंदिरापुरम के नागरिक अब चाहते हैं कि आगे की कोई भी घोषणा व्यावहारिक प्रगति के साथ बंधी हो, न कि केवल कागज़ी वादे पर आधारित।
Published: May 9, 2026