हजारों डॉलर की वृद्धि: स्ट्रेट ऑफ़ होरमुज़ में अस्थिरता से तेल की कीमतें $113 से ऊपर
बुधवार को अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में तीव्र उछाल देखा गया, जहाँ ब्रेंट क्रूड ने 6 % की छलांग लगाकर $114.44 दॉलर प्रति बैरल और अमेरिकी WTI ने 4 % बढ़कर $106.42 दॉलर पर ट्रेड किया। यह उछाल मुख्यतः स्ट्रेट ऑफ़ होरमुज़ में बढ़ती भू-राजनीतिक तनाव के कारण हुआ, जहाँ इरान‑समर्थित समूहों द्वारा हमला और दुश्मनी की खबरों ने आपूर्ति बाधित हो जाने का डर पैदा किया।
उत्तरी यूएई में स्थित फ़ुजैराह तेल उद्योग क्षेत्र (FOIZ) पर एक ड्रोन हमला ने इस उछाल को और तेज़ किया। स्थानीय अधिकारियों ने इस हमले की जिम्मेदारी इरान की ओर आरोपित की, जबकि आईएफओएफ़ की सुरक्षा प्रोटोकॉल पर सवाल उठाने वाले विशेषज्ञ इस घटना को “नियामकीय लापरवाही” का संकेत मानते हैं, क्योंकि इस क्षेत्र में कई अंतरराष्ट्रीय तेल कंपनी और भंडारण सुविधाएँ स्थित हैं।
भारत के लिए इसका प्रभाव कई आयामों में दिखेगा। विश्व बाजार में तेल की कीमतों में इस स्तर की बढ़ोतरी से आयातित कच्चे तेल की लागत में अनुमानित 8‑10 % वृद्धि होगी, जिससे मासिक अंतरराष्ट्रीय भुगतान में लगभग $2 अरब का अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है। इससे भारत के ट्रेड बैलेंस पर दबाव बढ़ेगा, जबकि मौजूदा यूएस़डी/रुपया विनिमय दर में अस्थिरता से महंगाई पर और भी अनिश्चितताएँ उत्पन्न होंगी।
ऊर्जा‑संबंधी नीतियों के संदर्भ में, केंद्र सरकार ने पिछले महीनों में ईंधन सब्सिडी को घटाने और पेट्रोल‑डिजल पर वैट लागू करने की योजना घोषित की थी। अब बढ़ती पेट्रोल कीमतें उपभोक्ताओं के खर्च में सीधा असर डालेंगी, जिससे परिवहन लागत, कृषि इनपुट और वस्तु मूल्य स्तर पर अतिरिक्त प्रेशर उत्पन्न होगा। उपभोक्ता संगठनों ने इस दौर में “न्यायसंगत मूल्य निर्धारण” की मांग की है, जबकि सरकार को मौद्रिक नीति और ऊर्जा सुरक्षा के बीच संतुलन बनाते हुए त्वरित राहत प्रदान करनी चाहिए।
कॉरपोरेट क्षेत्र की जिम्मेदारी भी यहाँ सवाल बनती है। फ़ुजैराह में स्थित प्रमुख तेल भंडारण कंपनियों को सुरक्षा मानकों का पुनरावलोकन करने, ड्रोन्स और अन्य असामान्य खतरों के प्रति प्रभावी प्रतिक्रिया योजना तैयार करने तथा अंतरराष्ट्रीय बीमा संस्थाओं के साथ जोखिम‑आधारित प्रीमियम पर चर्चा करने की आवश्यकता है। नियामक निकाय, जैसे कि यूएई के राष्ट्रीय तेल कंपनी और अंतरराष्ट्रीय समुद्री सुरक्षा एजेंसियों, को इस घटना को एक चेतावनी मानकर सीमा‑परिचालन प्रोटोकॉल को सख्त करना चाहिए, नहीं तो भविष्य में समान हमले वैश्विक आपूर्ति शृंखला को और अधिक अस्थिर कर सकते हैं।
उपभोक्ता स्तर पर, तेल की कीमतों में इस वृद्धि का आभास न केवल पेट्रोल‑डिजल की रिटेल कीमतों में पड़ेगा, बल्कि सार्वजनिक परिवहन, एयरलाइन टैरिफ और वस्तु परिवहन लागत में भी परिलक्षित होगा। इनकी वजह से मुद्रास्फीति के मानक लक्ष्य से अधिक बढ़ने की संभावना है, जिससे भारतीय रिज़र्व बैंक को नीति‑समायोजन के विकल्पों पर पुनः विचार करना पड़ सकता है।
संकट के इस चरण में, नीति निर्माताओं की भूमिका केवल अल्पकालिक राहत प्रदान करने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए; वे दीर्घकालिक ऊर्जा आत्मनिर्भरता, वैकल्पिक ईंधन की त्वरित औद्योगीकरण और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा ढाँचों में भारत की रणनीतिक भूमिका को सुदृढ़ करने के उपायों पर भी विचार करने के कर्तव्य में हैं।
Published: May 5, 2026