हॉर्मुज में सालाना दो गुना अधिक प्राकृतिक गैस का अपव्यय, IEA के अनुसार
अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने अपने नवीनतम अध्ययन में बताया कि मध्य‑पूर्व के प्रमुख शिपिंग मार्ग हॉर्मुज जलडमरूमध्य में प्रति वर्ष वायुमंडल में छोड़ी जाने वाली मीथेन (प्राकृतिक गैस) की मात्रा पिछले आँकड़ों की तुलना में दो गुना अधिक है। यह अपव्यय न केवल जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों को तीव्र करता है, बल्कि वैश्विक गैस बाजार में कीमतों के उतार‑चढ़ाव को भी प्रभावित करता है, जिसका सीधा असर भारत जैसे बड़े आयातकों पर पड़ता है।
IEA के अनुसार, हॉर्मुज से गुजरते समय अनिवार्य रूप से पाइपलाइन में फँसी या इरानी एवं अरब समूह के द्वारा छीन लिए जाने वाली लगभग 45 अरब मानक घन मीटर (bcm) मीथेन वायुमंडल में निकासी हो रही है। यह आंकड़ा पहले के 20‑25 bcm की अनुमानित मात्रा से अधिक है, जिससे वार्षिक आर्थिक क्षति लगभग $12‑15 बिलियन के बराबर हो सकती है—खाली नुकसान ही नहीं, बल्कि उन गैसों को पकड़कर ऊर्जा में परिवर्तित करने से अतिरिक्त आपूर्ति पैदा होने की संभावना भी छूट रही है।
भारत की ऊर्जा नीति के दृष्टिकोण से यह अपव्यय कई पहलुओं में महत्त्वपूर्ण है। भारत की वार्षिक LNG आयात आवश्यकता लगभग 30‑35 bcm है, और विश्व भर में आपूर्ति का छोटा सा हिस्सा भी कीमतों में उल्लेखनीय परिवर्तन ला सकता है। हॉर्मुज में मीथेन का अपव्यय बढ़ने से वैश्विक गैस की उपलब्धता घटती है, जिससे दामों में 5‑7% की संभावित वृद्धि हो सकती है। परिणामस्वरूप भारत के पावर प्लांट, सीमेंट और स्टील जैसे ऊर्जा‑गहन उद्योगों को उच्च ईंधन लागत का सामना करना पड़ेगा, जो अंततः उपभोक्ताओं के बिजली बिल और वस्तु कीमतों में परिलक्षित होगा।
पिछले कुछ वर्षों में प्रमुख तेल‑गैस कंपनियों—जैसे सऊदी अरामको, ADNOC (UAE) और क़तर एनर्जी—पर मीथेन रिसाव को कम करने के लिए तकनीकी उपाय अपनाने का दबाव बढ़ा है। हालांकि, वर्तमान में अधिकांश पाइपलाइन और निर्यात‑टर्मिनलों में गैस‑कैप्चर या फ्लेयर‑रिडक्शन की पूर्ण तैनाती नहीं हुई है। कंपनियों का तर्क अक्सर ‘तकनीकी जटिलता’ और ‘अधिक लागत’ के इर्द‑गिर्द घूमता है, जिससे पर्यावरणीय जिम्मेदारी के प्रश्न उठते हैं।
नियामकीय संदर्भ में देखें तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मीथेन उत्सर्जन को कम करने के लिए कई पहलें चलाई जा रही हैं—जैसे यू.एन.एफसीसीसी के मीथेन जारी‑मुक्ति संधि के तहत वाइस‑बोर्ड, और यूरोपीय संघ की मीथेन इंटेंसिटी रेगुलेशन। भारत ने भी अपने राष्ट्रीय दायित्व (NDC) के अंतर्गत मीथेन में 30% कटौती का लक्ष्य तय किया है, परंतु घरेलू रूप से मीथेन मॉनिटरिंग नेटवर्क अभी विकसित चरण में है। हॉर्मुज जैसी अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्य में मीथेन के अपव्यय को रोकने के लिए कोई सार्वभौमिक नियामक ढांचा नहीं है, जिससे उत्पादक देशों में नियम‑लागू करने की लहर धीमी रहती है।
आर्थिक दृष्टिकोण से इस अपव्यय को रोकने का अवसर स्पष्ट है। यदि मीथेन को प्रभावी ढंग से कैप्चर करके पुनः संसाधित किया जाए, तो विश्व बाजार में अतिरिक्त 40‑50 bcm की गैस उपलब्ध हो सकती है, जो भारत सहित बड़े आयातकों को सस्ते दामों पर ऊर्जा सुरक्षा प्रदान करेगी। अनुमानित रूप से, यह भारत को वार्षिक $4‑5 बिलियन की आयात लागत बचत दे सकता है, साथ ही मीथेन लीक से उत्पन्न 0.5‑1 % तक के कार्बन नियोजन में कटौती भी संभव होगी।
समानांतर रूप से, इस मुद्दे पर नियामकीय ढील और निरीक्षण की कमी को भी उजागर किया जाना चाहिए। अधिकांश शिपिंग कंपनियों द्वारा लागू किए गए ‘वैकल्पिक उत्सर्जन रिपोर्टिंग’ मानकों में अंतर है, और अक्सर रिपोर्टें स्वैच्छिक आधार पर तैयार होती हैं। इस अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष में पारदर्शिता एवं दायित्व को सुदृढ़ करने के लिए भारत सहित आयातकों को बहुपक्षीय मीथेन निगरानी समझौतों में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए, जिससे निर्यात‑देशों पर दबाव बना रहे कि वे वायुमंडलीय अपव्यय को कम करने के ठोस कदम उठाएँ।
समग्र रूप से, IEA की रिपोर्ट ने न केवल पर्यावरणीय चिंता को उभारा है, बल्कि एक आर्थिक चेतावनी भी दी है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य में मीथेन अपव्यय को सीमित करना, ऊर्जा सुरक्षा, लागत‑प्रभावशीलता और जलवायु लक्ष्य के ताले को एक साथ खोल सकता है। यह चुनौती सरकार, नियामक संस्थान और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बीच एक समन्वित नीति‑निर्माण की माँग करती है—जिसमें मीथेन कैप्चर तकनीक में निवेश, अंतरराष्ट्रीय डाटा‑शेयरिंग तंत्र, और प्रभावी मीथेन‑टैक्स या क्रेडिट स्कीम शामिल हों। तभी भारत को वैश्विक गैस बाजार में स्थापित स्थिरता और किफायती ऊर्जा प्राप्त हो सकेगी, और साथ ही जलवायु परिवर्तन के खिलाफ वैश्विक संघर्ष में एक ठोस कदम उठाने का अवसर मिलेगा।
Published: May 4, 2026