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Category: व्यापार

हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में अराजकता: भारतीय शिपिंग कंपनियों को दिशा चुननी पड़ेगी

पर्सियन गल्फ में स्थित हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य, विश्व के प्रमुख तेल ट्रांसपोर्ट मार्गों में से एक है। हालिया सुरक्षा‑गड़बड़ी के कारण कई टैंकर इस जलडमरूमध्य में फँस गए हैं और अभी भी अपने रूट से बाहर निकलने का निर्णय नहीं ले पाए हैं। अमेरिका ने इन जहाज़ों को सुरक्षित रूप से मार्ग से बाहर निकालने की सहायता का वचन दिया है, पर शिपिंग कंपनियों की वास्तविक कार्रवाई अभी अनिश्चित है।

हॉर्मुज़ की बन्दिश सीधे भारतीय ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित करती है। भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है और उसके 30 % से अधिक आयात इस जलडमरूमध्य से गुजरते हैं। यदि टैंकर लगातार रुके रहें तो समुद्री मालभाड़े में उल्लेखनीय वृद्धि होगी, जबकि बीमा प्रीमियम भी ऊँचा रहता है। इससे रिफ़ाइनेरी लागत में बढ़ोतरी, अंततः डीज़ल व पेट्रोल की खुदर्‍ती कीमतों पर दबाव पड़ेगा।

शिपिंग फर्में इस जोखिम को दो मुख्य रूप से संभाल रही हैं: या तो मौजूदा स्थितियों में जहाज़ों को लंगर डालकर इंतज़ार करती हैं, या वैकल्पिक मार्ग—जैसे कि अफ़्रीका के केप वर्दे के पास से समुद्र‑मार्ग—का प्रयोग करती हैं। दोनों विकल्पों में अतिरिक्त डीज़ल खर्च और समय की हानि शामिल है, जो माल के उपभोगकर्ता एवं अंतिम उपयोगकर्ता दोनों को प्रभावित करता है।

वित्तीय दृष्टिकोण से देखें तो इस अराजकता से समुद्री परिवहन कंपनियों के बुकिंग रेट में अस्थायी गिरावट हुई है, जबकि ऑपरेशनल खर्चों में इज़ाफ़ा हुआ है। कई भारतीय शिपिंग कंपनियों ने अपने पूँजी निर्यात को स्थगित कर दिया है, जिससे उनके शेयर मूल्य में दो‑तीन प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई है। साथ ही, अंतर्राष्ट्रीय शिपिंग बीमा कंपनियों ने जोखिम श्रेणी को ‘उच्च’ कर दिया है, जिससे प्रीमियम में 15‑20 % तक वृद्धि हुई।

इस परिदृश्य में नियामक प्रतिक्रिया भी प्रमुख मुद्दा बनती है। भारत सरकार ने रणनीतिक तेल भंडार (Strategic Petroleum Reserve) के विस्तार की घोषणा कर दी थी, पर अभी तक पर्याप्त भंडारण क्षमता नहीं बन पाई है। साथ ही, समुद्री सुरक्षा के उच्च मानकों को लागू करने हेतु प्रगतिशील मानक का अभाव है, जिससे शिपिंग कंपनियों को अपने जोखिम प्रबंधन में खुद ही पहल करनी पड़ती है।

अमेरिका के समर्थन का आश्वासन जोखिम को कम करने में मददगार हो सकता है, पर यह स्पष्ट नहीं है कि यह सहायता कब और किस हद तक उपलब्ध होगी। भारतीय शिपिंग उद्योग को अब तत्काल दो‑तीन विकल्पों को प्राथमिकता देनी चाहिए: (i) वैकल्पिक मार्गों की पूर्व-तैयारी, (ii) बीमा कवरेज का पुनः‑समायोजन, और (iii) सरकार के साथ मिलकर रणनीतिक भंडार की तेज़ी से पूर्ति। इन कदमों से न सिर्फ वर्तमान अस्थिरता को नियंत्रित किया जा सकेगा, बल्कि भविष्य में एकल जलडमरूमध्य पर अत्यधिक निर्भरता को कम करने की नींव भी रखी जा सकेगी।

Published: May 5, 2026