सरकार ने 2026-27 के लिए गन्ने की FRP को 365 रुपये प्रति क्विंटल कर बढ़ाया
केंद्रीय सरकार ने इस साल के गन्ने के लिये Fair Reasonable Price (FRP) को 365 रुपये प्रति क्विंटल करने का निर्णय लिया। यह बढ़ोतरी पिछले वित्तीय वर्ष की FRP 330 रुपये प्रति क्विंटल से 35 रुपये (लगभग 10.6%) अधिक है। नीति निर्माताओं ने इनपुट खर्चों में निरंतर वृद्धि, वस्तु मूल्य सूचकांक (CPI) में चढ़ाव और किसानों की आय में गिरावट को प्रमुख कारण बताया है।
इनकी अपेक्षित आय वृद्धि प्रतिक्विंटल 35 रुपये की है, जिससे औसत कटाई के लिये लगभग 1,500 रुपये प्रति हेक्टेयर अतिरिक्त आय की संभावनाएँ बनती हैं। विशेष रूप से छोटे व छोटे किसानों को इस कदम से लाभ मिलने की आशा है, क्योंकि गन्ना कई क्षेत्रों में प्रमुख नकदी‑फसल है।
हालाँकि, इस कीमत में वृद्धि का सार्वजनिक वित्त पर प्रत्यक्ष असर है। FRP के तहत सरकार को प्रदायगी मूल्य के अंतर को सब्सिडी के रूप में मिल्कों को देना पड़ता है, जहाँ मिल्कों को अधिकतम 445 रुपये प्रति क्विंटल मिलक लिंक्ड प्राइस (MLP) मिलती है। अंतर को पाटने के लिये केन्द्र को अतिरिक्त ₹5,500 करोड़ की अनुमानित व्यय मानते हुए बताया गया है, जिससे व्यय‑आधारित बजट धारा पर दबाव बढ़ेगा और राजकोषीय घाटे को और विस्तारित कर सकता है।
शुगर उद्योग के लिये भी यह कदम मिश्रित है। उच्च रिपोर्टेड किंमत से मिल्कों के लिये क्रय लागत में बढ़ोतरी होगी, जिससे उनकी ऑपरेटिंग मार्जिन घट सकती है, विशेषकर उन मिल्कों के लिये जो कम उत्पादन दक्षता या पुरानी तकनीक पर निर्भर हैं। दूसरी ओर, किसानों की ऊँची आय के कारण कटाई प्रेरणा बढ़ सकती है, जिससे उत्पादन की मात्रा में वृहद् वृद्धि की सम्भावना है। यदि उत्पादन में असमान संतुलन बना रहा तो बाजार में अधिक आपूर्ति के कारण वैध निर्यात या जमा‑स्टॉक की लागत बढ़ेगी।
उपभोक्ता वर्ग पर प्रभाव भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। शुगर की कीमत में संभावित वृद्धि सीधे खाद्य महँगाई को प्रेरित करेगी, विशेषकर उन वर्गों में जहाँ चीनी आयातित या निर्मित वस्तुओं में प्रमुख घटक है। यह अभूतपूर्व महँगाई के माहौल में मध्यम व निम्न आय वर्ग के लिये अतिरिक्त बोझ बन सकता है।
नीतिगत दृष्टिकोण से यह आवश्यक है कि FRP निर्धारण के पीछे स्पष्ट और पारदर्शी मूल्य‑निर्धारण तंत्र स्थापित हो, जिससे मूल्य‑समीक्षा में देरी और असमानता कम हो सके। कई विशेषज्ञों ने कहा है कि सिर्फ मूल्य वृद्धि से किसानों के वास्तविक आय में सतत सुधार नहीं हो सकता जब तक कि फसल बीमा, बाजार अभिगमन, और प्रोसेसिंग‑छोटा‑बड़ा श्रृंखला में सुधार न किया जाये।
आलोचक इस कदम को सहज‑सुविधा के रूप में देख रहे हैं, क्योंकि यह मौजूदा संरचनात्मक समस्याओं को नहीं घटाता। शुगर मिल्कों को अतिरिक्त सब्सिडी मिलने से लंबे समय में वहन‑शक्ति पर बोझ बढ़ेगा और राजकोषीय स्थिरता को चुनौती मिलेगी। साथ ही, इस प्रकार की कीमत‑परिवर्तन नीति अक्सर अस्थायी राहत देती है, जबकि दीर्घकालिक सुधार—जैसे फसल विविधीकरण, वैकल्पिक आय स्रोत, और तकनीकी उन्नयन—पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता।
समग्र रूप से, गन्ने की FRP में वृद्धि किसानों को तत्काल लाभ प्रदान कर सकती है, परन्तु यह आर्थिक नीति के विस्तृत दायरे में व्यय‑संतुलन, उद्योग प्रतिस्पर्धा, और उपभोक्ता महँगाई के प्रश्न उठाती है। सरकार को चाहिए कि यह कदम वित्तीय अनुशासन के साथ मिलाकर, सतत कृषि‑उद्योग को सुदृढ़ करने वाली समग्र रणनीति के हिस्से के रूप में लागू करे।
Published: May 5, 2026