जो होना ही था, उसे दर्ज करता, देखता और सवाल करता समाचार मंच

Category: व्यापार

सेबी के चेतावनी के कारण बैंकों और बीमाकर्ताओं ने कोमेक्स से दूर रहना शुरू किया, भौतिक डिलीवरी के लिए जीएसटी में सुधार आवश्यक

सिक्योरिटीज़ एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ़ इंडिया (सेबी) के प्रमुख ने कहा कि नियामक‑संबंधी चिंताओं के कारण भारतीय बैंकों और बीमा कंपनियों ने कोमेक्स (कमोडिटी एक्सचेंज) में सहभागिता से हिचकिचाहट दिखाई है। इस स्थिति को बदलने के लिए भौतिक वस्तु डिलीवरी पर लागू जीएसटी ढांचे में संशोधन की आवश्यकता पर बल दिया गया।

वित्तीय संस्थाओं के लिए कमोडिटी ट्रेडिंग में भाग लेना दो प्रमुख जोखिमों से जुड़ा है – परिसंपत्ति‑आधारित लेन‑देनों पर नियामक अनुपालन और पूंजी आवश्यकताओं का बोझ। सेबी ने बताया कि मौजूदा नियमों में वस्तु की शारीरिक डिलीवरी को लेकर स्पष्ट मानक नहीं हैं, जिससे AML/केवाईसी प्रक्रियाओं में जटिलता बढ़ती है। इसके अलावा, भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) की सावधानी बैंकर पूँजी मानदंड और बीमा कंपनियों के लिए इन्श्योरेंस वाणिज्यिक जोखिम प्रबंधन दिशानिर्देशों की कमी ने संस्थाओं को व्यापक रूप से प्रतिबंधित कर दिया है।

इन नियामक अड़चनें भारतीय कमोडिटी बाजार की गहरीकरण योजना को बाधित करती हैं। यदि बड़े वित्तीय खिलाड़ी कोमेक्स से बाहर रहेंगे तो बाजार में तरलता घटेगी, प्रीमियम मूल्य निर्धारण अस्थिर रहेगा और घरेलू उत्पादकों को हेजिंग के वैकल्पिक साधन मिलने में कठिनाई होगी। इस पर असर न केवल खेती‑उद्योग को बल्कि धातु, ऊर्जा और पेट्रोकेमिकल क्षेत्रों के निर्यातकों एवं आयातकों पर भी पड़ेगा, जहाँ मूल्य जोखिम प्रबंधन मौलिक है।

सरकार ने कई बार कमोडिटी बाजार को वैश्विक मानकों के साथ संरेखित करने का आश्वासन दिया है, परन्तु जीएसटी‑संबंधी तकनीकी मुद्दे अभी भी अवरोध बन कर खड़े हैं। भौतिक डिलीवरी पर वर्तमान में लागू 5% कर दर, साथ ही विभिन्न चरणों में इनपुट टैक्स क्रेडिट की अनिश्चितता, वित्तीय संस्थानों को वस्तु‑आधारित फाइनेंस प्रदान करने से रोकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि जीएसटी अधिनियम में विशेष प्रावधान करके केवल डिलीवरी‑सम्बंधी लेन‑देन पर टैक्स‑क्रेडिट को स्पष्ट रूप से अनुमति देनी चाहिए, जिससे दोहरे कराधान की संभावना समाप्त हो सके।

उपभोक्ता स्तर पर भी इस स्थगन के नतीजे स्पष्ट हैं। वस्तु कीमतों में अस्थिरता का सीधा असर ग्राहकों के खर्ची क्षमता और महंगाई के आंकड़ों पर पड़ता है। जब कंपनियां उचित हेजिंग नहीं कर पातीं, तो वह लागत अंततः समाप्ति‑उपभोक्ता को ढालती है। इस पर नियामकों का त्वरित कदम लेना आवश्यक है, ताकि वित्तीय संस्थानों को भरोसेमंद माहौल मिल सके और भारत के कमोडिटी बाजार को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाया जा सके।

Published: May 5, 2026