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Category: व्यापार

सैंटा मार्टा जलवायु सम्मेलन: जीवाश्म ईंधन युग के अंत की संभावना और भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

कोलंबिया के सैंटा मार्टा शहर में पिछले सप्ताह 57 देशों के प्रतिनिधियों ने एक ऐतिहासिक जलवायु बैठक का आयोजन किया, जिसका मुख्य उद्देश्य जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता को कम कर नवीनीकृत ऊर्जा की ओर तेज़ संक्रमण को साकार करना था। यह पहल वैश्विक स्तर पर जलवायु लक्ष्यों के तहत सबसे बड़े समूह को एक साथ लाने वाली पहली पहल है, परन्तु इसका आर्थिक प्रभाव विशेषकर भारत जैसी ऊर्जा‑उपभोक्ता अर्थव्यवस्थाओं में गहरा होगा।

वैश्विक स्तर पर जीवाश्म ईंधन को समर्थन देने वाले सब्सिडी का अनुमान लगभग 5.9 ट्रिलियन डॉलर है, जबकि नवीकरणीय ऊर्जा में वार्षिक निवेश 1 ट्रिलियन डॉलर से अधिक दरज हो रहा है। भारत इस संक्रमण में दोहरी भूमिका में खड़ा है: लगभग 70% विद्युत उत्पादन अभी भी कोयले पर निर्भर है, जबकि सरकार ने 2030 तक 450 गिगावॉट नवीनीकृत क्षमता हासिल करने का लक्ष्य तय किया है, जिसके लिए अनुमानित 250 बिलियन डॉलर का अतिरिक्त निवेश आवश्यक है।

सैंटा मार्टा सम्मेलन के शपथपत्र के संभावित परिणाम भारत में कई आर्थिक आयामों को प्रभावित करेंगे। सबसे पहले, कोयला उद्योग के प्रमुख सार्वजनिक संस्थान, जैसे कोयला इंडिया लिमिटेड, को अगर उच्च-स्तरीय जलवायु प्रतिबद्धताओं को लागू किया गया तो ‘स्ट्रैंडेड एसेट’ जोखिम का सामना करना पड़ेगा। इससे संबंधित श्रम बाजार में संभावित विस्थापन हो सकता है, क्योंकि खनन क्षेत्र में रोजगार का बड़ा हिस्सा अभी भी कोयला उत्पादन से जुड़ा है। दूसरी ओर, नवीनीकृत ऊर्जा, विशेषकर सौर और पवन क्षेत्र में निवेश तेज़ी से बढ़ेगा, जिससे नई नौकरियों का सृजन और तकनीकी कौशल की मांग बदलेगी।

ऊर्जा आयात पर भी असर स्पष्ट है। भारत का तेल आयात बिल वार्षिक लगभग 120 बिलियन डॉलर है, और अगर जीवाश्म ईंधन के उपयोग में धीरे‑धीरे कमी आती है तो यह बुनियादी आयात खर्च घट सकता है, जिससे व्यापार घाटे में गिरावट की संभावना बनती है। परन्तु संक्रमण लागत, जैसे कोयला संयंत्रों का बंद करना, पुनर्वास कार्य और नई ग्रिड बुनियादी ढाँचा निर्माण, प्रारंभिक वर्षों में सार्वजनिक वित्त पर दबाव डाल सकती है।

नियामकीय दृष्टिकोण से भारत ने पेरिस समझौते के तहत 2030 में सामग्री उत्सर्जन घटाने के लक्ष्य घोषित किए हैं और सौर ऊर्जा के लिए GST में छूट तथा हाइड्रोजन इंधन पर प्रोत्साहन उपाय लागू किए हैं। फिर भी, कोयला को सब्सिडी देने वाली मौजूदा नीतियों में पतली रेखा अभी भी मौजूद है, जो नीति‑विरोधाभास को उजागर करती है। यदि सैंटा मार्टा के प्रतिबद्धताओं को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के समर्थन के साथ सुदृढ़ किया गया, तो भारतीय राजस्व प्रणाली को पुन:संतुलित करने की आवश्यकता पड़ेगी।

समारोह में कई बड़े जीवाश्म ईंधन निर्यातकों—जैसे संयुक्त राज्य, सऊदी अरब और रूस—की अनुपस्थिति बताती है कि वैश्विक परिवर्तन अभी भी राजनैतिक प्रतिरोध का सामना कर रहा है। पूंजी प्रवाह के संदर्भ में, अंतरराष्ट्रीय बैंकों और निजी इक्विटी फंडों द्वारा नवीनीकृत ऊर्जा परियोजनाओं में निवेश की गति त्वरित हो सकती है, लेकिन इस गति को बनाए रखने के लिए स्पष्ट नियामकीय फ्रेमवर्क और कॉरपोरेट उत्तरदायित्व की मजबूत निगरानी आवश्यक है।

संक्षेप में, सैंटा मार्टा जलवायु सम्मेलन जीवाश्म ईंधन युग को समाप्त करने की दिशा में एक प्रेरक कदम है, परन्तु उसकी सफलता भारतीय बाजार, ऊर्जा संरचना और रोजगार पर वास्तविक प्रभाव डालने के लिये नीति‑समर्थन, वित्तीय स्थिरता और कॉरपोरेट अनुकूलन के समग्र संयोजन पर निर्भर करेगी।

Published: May 6, 2026