विकासशील देशों में बढ़ते ऋण बोझ से महिलाओं को नौकरी की असुरक्षा और बढ़ती देखभाल की जिम्मेदारी, भारत में असर स्पष्ट
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) द्वारा प्रकाशित एक विस्तृत अध्ययन ने इंगित किया है कि विकासशील देशों में सार्वजनिक ऋण का बोझ बढ़ने पर महिलाओं को सबसे अधिक आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता है। 85 देशों में तीन दशकों तक जुटाए गए आँकों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया कि ऋण भुगतान में वृद्धि के साथ महिला श्रम शक्ति के बाहर निकलने की संभावना तेज़ हो जाती है, जबकि उनकी अनभुगतान देखभाल की जिम्मेदारियां बढ़ती हैं।
भारत में भी इसी प्रकार के संकेत दिख रहे हैं। पिछले पाँच वर्षों में सार्वजनिक ऋण‑से‑जीडीपी अनुपात में लगभग 6 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, और कई राज्यों ने मौद्रिक प्रतिबंधों के चलते विकासात्मक खर्चों में कटौती की धारा अपनाई है। इस कटौती का पहला असर शिक्षा, स्वास्थ्य तथा सामाजिक संरक्षण क्षेत्रों में दिखा, जहाँ अधिकांश कार्यभार महिलाओं पर ही पड़ता है।
बेरोज़गारी के आंकड़े दर्शाते हैं कि औद्योगिक और सेवा क्षेत्रों में महिलाओं की निर्यात‑उन्मुख नौकरियों में गिरावट 2024‑2025 में 3.2 प्रतिशत रही, जबकि समान अवधि में पुरुषों की नौकरी सुरक्षा पर प्रभाव तुलनात्मक रूप से कम रहा। इससे घरेलू देखभाल, बच्चों की शिक्षा और बुजुर्गों की देखरेख का बोझ महिलाओं पर असमान रूप से बढ़ा।
आर्थिक दृष्टिकोण से यह प्रवृति दोहरी चुनौती पेश करती है। पहली ओर, श्रम बाजार में महिलाओं की भागीदारी घटने से सकल राष्ट्रीय उत्पाद (GDP) की संभावित वृद्धि बाधित हो सकती है, क्योंकि विश्व संस्थान की अनुमानित वृद्धि दर महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण पर निर्भर करती है। दूसरी ओर, देखभाल कार्य में वृद्धि उपभोक्ता खर्च में कमी का कारण बनती है, जिससे घरेलू वस्तुओं व सेवाओं की मांग में गिरावट आती है, जो खुदरा और एजीएम (एग्रीकल्चर, गैस, मैन्युफैक्चरिंग) क्षेत्रों को भी प्रभावित कर सकती है।
नियामकीय पहलुओं पर नजर डालें तो भारत सरकार ने 2025 में ऋण प्रबंधन के तहत ‘इक्विटी‑इज़‑डिटॉक्स’ नीति का उल्लेख किया था, जिसका उद्देश्य सार्वजनिक निवेश को निजी‑खर्च से अलग करना था। हालांकि, इस नीति के कार्यान्वयन में पारदर्शिता और सामाजिक सुरक्षा निधियों के पुनः आवंटन में अस्पष्टता बनी हुई है। खोज के अनुसार, कई सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में वित्तीय कटौती की गई, जिससे लाभार्थी महिलाओं को सीधा नुकसान पहुंचा।
इन चुनौतियों के समाधान के लिए नीति निर्माताओं को दो महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश अपनाने चाहिए। प्रथम, ऋण पुनर्गठन या दायित्व‑विलंब (debt moratorium) के दौरान सामाजिक सुरक्षा बैरियर को मजबूत करना तथा महिलाओं के लिए विशिष्ट पुनरुद्धार फंड स्थापित करना आवश्यक है। द्वितीय, देखभाल कार्य को सार्वजनिक और निजी दोनों स्तरों पर मान्यता देते हुए कर छूट, बाल देखभाल केंद्रों के लिए पूंजी सब्सिडी और लचीले कार्य समय की व्यवस्था को अनुबंधित करना चाहिए। ऐसा कदम न केवल लैंगिक असमानता को घटाएगा, बल्कि श्रम उत्पादकता बढ़ाकर कुल आर्थिक विकास को भी समर्थन देगा।
संक्षेप में, विकासशील राष्ट्रों में ऋण भुगतान के व्यय में वृद्धि के साथ उत्पन्न हो रही महिलाओं की बेज़रूरत आर्थिक बोझ भारत में भी स्पष्ट हो रहा है। यह क्रमिक आर्थिक दबाव न केवल लैंगिक असमानता को गहरा करता है, बल्कि राष्ट्रीय उत्पादन और उपभोक्ता व्यय को भी घटाता है। सरकार और वित्तीय नियामकों को तत्काल प्रभावी उपायों के माध्यम से महिलाओं के रोजगार एवं देखभाल कार्य को संतुलित करने की जरूरत है, ताकि भविष्य में स्थायी और समावेशी विकास की राह प्रशस्त हो सके।
Published: May 4, 2026