लीदर‑फुटवियर उद्योग की कच्चे माल की लागत में 40‑60 % की बढ़ोतरी, आयात शुल्क में राहत की माँग
मध्य पूर्व में जारी जियो‑पॉलिटिकल तनाव के कारण पेट्रोलियम‑आधारित सामग्री, जैसे कि पेट्रोलियम‑आधारित कच्चा लेदर, रबर एवं सिंथेटिक फाइबर, की विश्वव्यापी कीमतों में 40‑60 % की तीव्र वृद्धि हुई है। इस उभार का सीधा असर भारत के लेदर और फुटवेज सेक्टर पर पड़ रहा है, जहाँ इन सामग्रियों का आयात लगभग 70 % तक निर्भर है।
उद्योग संघों के अनुसार, बढ़ी हुई इनपुट लागत से निर्माताओं की उत्पादन मार्जिन घट रही है, जिससे निर्यात की प्रतिस्पर्धात्मकता भी खतरे में है। वार्षिक अनुमानित उत्पादन लागत में बढ़ोतरी के परिणामस्वरूप, कई मध्य‑स्तरीय और छोटे-स्तर के कारखानों को मूल्य‑संतुलन बनाए रखने के लिए खुदरा मूल्य बढ़ाने या उत्पादन को घटाने पर विचार करना पड़ रहा है। इससे रोजगार‑संरक्षण और उपभोक्ता हित दोनों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
उद्योग प्रतिनिधियों ने मौजूदा कस्टम्स एवं GST आयात शुल्क को अस्थायी रूप से हटाने या कम करने का प्रस्ताव रखा है। वे तर्क देते हैं कि यदि कच्चे माल पर 0 % आयात शुल्क दिया जाए, तो उत्पादन लागत में लगभग 15‑20 % की कमी आ सकती है, जिससे निर्यात‑उन्मुख कंपनियों को वैश्विक बाजार में कीमत‑लाभ की स्थिति मिल सकेगी। इसके अलावा, मशीनरी एवं उपकरणों पर भी रियायती दरें दी जाएँ, तो दीर्घकालिक उत्पादन क्षमता में सुधार संभव होगा।
वित्त मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, इस वर्ग पर वर्तमान में लगने वाला औसत आयात शुल्क लगभग 12 % है, जिससे वार्षिक राजस्व में लगभग ₹1,500 करोड़ की आय जुड़ती है। इसलिए, सरकार को आयात शुल्क में छूट देने से संभावित राजस्व हानि को कम‑से‑कम दो‑तीन वर्षों में बढ़ती निर्यात आय और रोजगार सृजन से पूरित किया जा सकता है, यह तर्क उद्योग पक्ष पेश करता है। लेकिन इस दावें को सत्यापित करने हेतु विस्तृत लागत‑लाभ विश्लेषण की आवश्यकता है।
नियामकीय दृष्टिकोण से, इस मुद्दे पर मौजूदा “ड्युटी‑फ्री” नीति के तहत केवल कुछ विशेष वस्तुओं को छूट दी गई है, जबकि लेदर‑फुटवियर उद्योग को अभी तक इस फ्रेमवर्क में शामिल नहीं किया गया है। नीति‑निर्माताओं को इस अंतर को पाटते हुए, सेक्टर‑विशिष्ट दायित्व‑रहित आयात सुविधाएँ प्रदान करने की दिशा में कार्य करना चाहिए। साथ ही, इस राहत को अस्थायी रूप‑से—जैसे 6‑12 महीने—निर्धारित करके, बाजार के प्रतिक्रिया एवं राजस्व प्रभाव को समय‑समय पर मॉनिटर किया जा सकता है।
उपभोक्ता हित में भी इस कदम की अहमियत स्पष्ट है। यदि निर्माताओं को लागत‑बढ़ोतरी को ग्राहक तक पहुँचाना पड़े तो फुटवियर की खुदरा कीमतों में 15‑20 % की अतिरिक्त वृद्धि हो सकती है, जो मध्यम वर्ग के मौजूदा खर्च दायरे को प्रभावित करेगी। इसलिए, सरकार को हल्के‑फुल्के उपायों के बजाय स्थायी समाधान—जैसे वैकल्पिक कच्चे माल की शोध एवं उत्पादन, तथा इको‑फ्रेंडली तकनीकियों को प्रोत्साहन—पर भी ध्यान देना चाहिए।
सारांश में, मध्य पूर्व के संकट से उत्पन्न लागत‑उत्पादक दबाव को कम करने हेतु आयात शुल्क में अस्थायी राहत प्रदान करना, निर्यात‑उन्मुख लेदर‑फुटवियर उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मकता, रोजगार सुरक्षा और उपभोक्ता मूल्य स्थिरता के लिये आवश्यक प्रतीत होता है। इस दिशा में नीति‑निर्माण को डेटा‑आधारित, पारदर्शी और समय‑सीमित ढाँचे के भीतर किया जाना चाहिए, ताकि वित्तीय घाटा और उद्योग को लाभ—दोनों का संतुलन बन सके।
Published: May 4, 2026