रुपया इतिहास के सबसे निचले स्तर पर, 2013 की RBI नीति फिर से लागू हो सकती है
भारतीय रुपये ने 5 मई को अपनी सबसे निचली दर दर्ज की, जब मध्य‑पूर्व में नई हिंसा के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेज़ी आई। डॉलर‑विरुद्ध रुपये की दर रु. 84.75 से आगे गिरती दिखी, जो पिछले दो दशकों में नई गिरावट है। इस तेज़ गिरावट से आयात लागत, महंगाई और निवेश वातावरण पर व्यापक असर पड़ता दिखा।
विश्लेषकों ने इस परिस्थितियों को 2013 के उस दौर से जोड़ते हुए बताया कि इस वर्ष के शुरुआती चरणों में RBI ने विदेशी मुद्रा बाजार में बड़े पैमाने पर डॉलर बेचे, ब्याज दरें बढ़ाई और तरलता के प्रबंधन के लिए खुले बाजार संचालन (OMOs) का उपयोग किया था। उस समय की नीति ने रुपये को समर्थन देने में कुछ हद तक सफलतापूर्वक कार्य किया, परंतु बाद में वैश्विक तेल की कीमतों में गिरावट और घरेलू वित्तीय स्थिति में सुधार के बाद RBI ने हस्तक्षेप कम कर दिया।
वर्तमान में दो मुख्य बाहरी दबाव रुपये को नीचे धकेल रहे हैं: तेल की कीमतों में लगभग 12 % की उछाल, जिससे आयात बिल में इज़र-इज़ाफा हुआ, और मध्य‑पूर्व में जारी अस्थिरता के कारण जो जोखिम प्रीमियम को बढ़ा रही है। इन कारकों से भारतीय विदेशी मुद्रा रिज़र्व पर अतिरिक्त दबाव बन रहा है, जबकि निर्यात में माइक्रो‑कटौती और मौजूदा व्यापार घाटा रुपये के समर्थन में बाधा बन रहा है।
जब RBI संभवतः 2013 की नीति को पुनः अपनाएगी, तो उसके विकल्पों में शामिल हैं:
- बाजार में सक्रिय रूप से डॉलर बेचना ताकि रुपये की मांग को पूरक किया जा सके;
- नीति दर में वृद्धिकरन, जिससे पैसे की लागत बढ़े और पूँजी बहिर्वहन पर प्रतिबंध लगे;
- पेयर एग्रीमेंट या स्वैप लकीर को विस्तारित करके विदेशी मुद्रा बाजार में लिक्विडिटी को व्यवस्थित किया जाए;
- बैंकों के लिए बंधक‑सुरक्षित ऋण के अनुपात को कम करके वित्तीय स्थिरता को सुदृढ़ किया जाए।
इन उपायों का प्रभाव विविध है। आयातकों को तेज़ी से बढ़ती तेल कीमतों के बावजूद कार्यशील पूँजी की कमी का सामना करना पड़ेगा, जिससे उत्पादन और एनीजेन खर्च में वृद्धि होगी। उपभोक्ताओं को ईंधन, बिजली और परिवहन की लागत में इज़ाफा महसूस होगा, जो महंगाई को 6‑7 % के लक्षित स्तर से ऊपर ले जा सकता है। दूसरी ओर, यदि RBI दरें बढ़ाता है तो घरेलू उधार लेने की लागत बढ़ेगी, जिससे रियल एस्टेट और ऑटो सेक्टर में निवेश को ठंडा करने की संभावना है।
नीतिगत पहलुओं को देखते हुए, RBI की स्वतंत्रता और उसके विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं। वर्तमान सरकारी वित्तीय नीति में राजकोषीय घाटा बढ़ रहा है, और रक्षा एवं बुनियादी ढाँचा खर्च में तेजी से वृद्धि हो रही है। इस परिप्रेक्ष्य में RBI को केवल मुद्रा स्थिरता नहीं, बल्कि वित्तीय स्थिरता और आर्थिक विकास को संतुलित करने की चुनौती का सामना करना पड़ेगा।
सारांश में, रुपये की ऐतिहासिक गिरावट ने मौजूदा आर्थिक प्रबंधन के लिए एक महत्वपूर्ण परीक्षा प्रस्तुत की है। 2013 की नीति को पुनः लागू करना तकनीकी रूप से संभव है, परंतु इसके लिए व्यापक बाजार संवाद, पारदर्शी संचार और संरचनात्मक सुधारों के साथ मिलाकर ही दीर्घकालिक स्थिरता हासिल की जा सकती है। अनिवार्य है कि नीति‑निर्माता विदेशी मुद्रा बाजार में अति‑हस्तक्षेप से बचें, क्योंकि इससे बाजार में अनिश्चितता और स्पेकुलेशन की संभावना बढ़ सकती है, जो दीर्घकालिक आर्थिक विश्वास को कमजोर कर सकती है।
Published: May 5, 2026