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Category: व्यापार

यूके में खाद्य कीमतें 50 % बढ़ी, जलवायु व ऊर्जा संकट के प्रभाव से भारत को सीख मिल सकती है

एनी थिंक‑टैंक के नवीनतम अध्ययन के अनुसार, यूनाइटेड किंगडम में 2021 के लागत‑जीवन संकट की शुरुआत से खाद्य कीमतें अब लगभग पचास प्रतिशत बढ़ गई हैं। इस उछाल का मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन‑प्रेरित असामान्य मौसम घटनाएँ और ऊर्जा कीमतों में तीव्र वृद्धि माना गया है।

विशेष रूप से बीफ़ तथा जैतून के तेल की लागत में सबसे अधिक बढ़ोतरी देखी गई, जहाँ दोनों वस्तुओं की कीमतें दो‑तीन साल में दो‑तीन गुना बढ़ी। कुल मिलाकर, पिछले पाँच वर्षों में खाद्य महँगाई की गति लगभग चार गुना तेज़ हो गई, जो दो दशकों के औसत वृद्धि दर के बराबर है।

भारत के लिए इस प्रवृत्ति के दो मुख्य निहितार्थ हैं। पहला, उच्च आयात‑निर्भरता वाले उत्पाद—जैसे तेल, मसाले और कुछ प्रोटीन स्रोत—पर विश्व बाजार में कीमतों के उतार‑चढ़ाव का सीधा असर पड़ता है। दूसरे, भारत के कृषि निर्यातकों को अंतर्राष्ट्रीय मूल्य‑संकट के दौरान प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिल सकता है, बशर्ते घरेलू उत्पादन लागत स्थिर रहे।

नियामकीय दृष्टिकोण से, भारत की मौजूदा मूल्य नियंत्रण नीतियां—जैसे थोक बाजार में नीतिनिर्धारित अधिकतम कीमतें और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के माध्यम से अनाज सब्सिडी—इसे सीमित करने में मददगार हो सकती हैं, परन्तु उनका दायरा अक्सर कच्चे माल और आयात‑आधारित वस्तुओं तक सीमित रहता है। यूके की स्थिति दिखाती है कि जब जलवायु‑संकट की परवर्ती शृंखला ऊर्जा‑स्रोतों को प्रभावित करती है, तो पारंपरिक मूल्य‑स्थिरीकरण उपाय पर्याप्त नहीं रह जाते।

उपभोक्ता स्तर पर इस महँगाई का असर सीधा है। खाद्य खर्च घरों के कुल खर्च के लगभग 15‑20 % हिस्से के बराबर है; 50 % की कीमत वृद्धि का अर्थ है कि मध्यम वर्ग के परिवारों को अपनी बचत में कटौती या आय में वृद्धि की आवश्यकता होगी। भारतीय उपभोक्ताओं के लिए इससे सस्ते विकल्पों की मांग में बदलाव और स्थानीय उत्पादन के प्रति रुझान बढ़ना संभव है।

अंत में, नीति निर्माताओं को जलवायु‑ऊर्जा जोखिम को दैनिक कीमतों में प्रतिबिंबित करने के लिए व्यापक रणनीति अपनानी होगी। इसमें नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार, कृषि में जलवायु‑सहिष्णु तकनीकों का प्रोत्साहन, और आयात‑कमी के लिए वैकल्पिक आपूर्ति शृंखलाओं का विकास शामिल है। यूके के अनुभव से स्पष्ट है कि बिना सुदृढ़ प्रतिरोधी ढाँचे के, खाद्य महँगाई न केवल उपभोक्ता मनोदशा को प्रभावित करती है, बल्कि व्यापक रूप से सामाजिक‑आर्थिक असमानताओं को भी गहरा कर देती है।

Published: May 4, 2026