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यूएई की शाही परिवार को मिल रहे यूरोपीय कृषि सब्सिडी, भारतीय किसानों पर प्रभाव
एक क्रॉस‑बॉर्डर जांच ने उजागर किया है कि संयुक्त अरब अमीरात के शासक अल नाह्यान परिवार की कुछ सहायक कंपनियां रोमानिया, इटली और स्पेन में नियंत्रित कृषि भूमि से छह वर्षों में 71 मिलियन यूरो (लगभग 6.1 अरब रुपये) की यूरोपीय कृषि सब्सिडी प्राप्त कर रही हैं। ये सब्सिडी यूरोपीय संघ के कॉमन एग्रीकल्चर पालिसी (CAP) के तहत दी जाती हैं, जिसका मूल उद्देश्य सदस्य देशों के किसानों को वित्तीय मदद, ग्रामीण विकास और खाद्य सुरक्षा प्रदान करना है।
वास्तविकता यह है कि इन सहायक कंपनियों की भूमि‑संधियों में अंततः अल नाह्यान परिवार की गहरी भागीदारी है। उन्हें यूरोपीय भूमि के किरायेदार या मालिक के रूप में पंजीकृत किया गया है, फिर भी भुगतान सीधे उन संस्थाओं को किया जाता है जो अपने फसल उत्पादन को गल्फ देशों के बाजारों के लिए निर्यात करती हैं, न कि यूरोपीय उपभोक्ताओं के लिए। इस प्रकार, यूरोपीय करदाता की वित्तीय सहायता का लाभ उन विदेशी अभिजात वर्ग को मिल रहा है, जिनका लक्ष्य घरेलू कृषि संरचना को सुदृढ़ करना नहीं बल्कि निर्यात‑उन्मुख व्यवसाय को बढ़ावा देना है।
इन सब्सिडियों के परिणामस्वरूप कुछ आर्थिक प्रभाव प्रकट होते हैं। सबसे पहले, उच्च कीमतों पर यूरोपीय भूमि की खरीदी‑बेची तेज़ हुई है, जिससे स्थानीय छोटे किसान प्रतिस्पर्धा में पीछे रह रहे हैं। दूसरे, अनावश्यक उत्पादन क्षमता में वृद्धि हुई है, जिससे वैश्विक कृषि वस्तु कीमतों में संभावित अस्थिरता उत्पन्न हो सकती है—जो भारतीय आयात‑निर्भर अनाज बाजार को भी प्रभावित कर सकती है।
नियामकीय दृष्टि से, इस मामले ने यूरोपीय संघ के CAP में मौजूदा अंतराल को उजागर किया है। वर्तमान नियम कई बार विदेशी निवेशकों को भूमि‑स्वामित्व और सहायक‑सहायता प्राप्त करने की अनुमति देते हैं, बशर्ते वे स्थानीय कानूनों का पालन करें। हालांकि, वास्तविक लाभार्थी के राष्ट्रीयता या अंतिम स्वामित्व के बारे में पर्याप्त जाँच नहीं की जाती, जिससे ऐसा माहौल बनता है जहाँ धनराशि का बहिर्वाह आसान हो जाता है। यह विषय यूरोपीय संसद में अब तक बहस का केंद्र रहा है, लेकिन कठोर नियामक सुधार अभी भी लंबित हैं।
वित्तीय प्रभाव के मामले में, 71 मिलियन यूरो का आंकड़ा काफी बड़ा है, जबकि भारतीय सरकार वार्षिक कृषि सब्सिडी के लिये लगभग 4 लाख करोड़ रुपये आवंटित करती है। यदि तुलना की जाये तो यूरोपीय सब्सिडी का दुरुपयोग भारत जैसे बड़े कृषि‑निर्भर देश में संसाधनों के उचित वितरण पर सवाल उठाता है। यह संकेत देता है कि नीतियों को केवल स्वरूप में ही नहीं, बल्कि कार्यान्वयन में भी पारदर्शी होना चाहिए।
सार्वजनिक परिणाम स्वरूप, इस प्रकार की अनपेक्षित लाभप्राप्ति से यूरोपीय नागरिकों में असंतोष और शासकीय भरोसे में कमी आ सकती है। भारत में, जहाँ किसान अक्सर सब्सिडी और नीतिगत समर्थन पर निर्भर होते हैं, ऐसी अंतरराष्ट्रीय मामलों से यह सीख मिलती है कि घरेलू कृषि नीतियों को बाहरी प्रभावों से बचाने के लिये कड़ा निगरानी तंत्र आवश्यक है। इससे न केवल किसानों के हित सुरक्षित रहेंगे, बल्कि उपभोक्ताओं को भी स्थिर कीमतों का लाभ मिलेगा।
समग्र रूप से, इस खुलासे ने दो प्रमुख प्रश्न उठाए हैं: एक, यूरोपीय संघ को अपनी कृषि सब्सिडी व्यवस्था में अंतरराष्ट्रीय अभिजात वर्ग के दुर्व्यवहार को रोकने हेतु सख्त मानकों की आवश्यकता है; दूसरा, भारत को अपनी सब्सिडी प्रणालियों में पारदर्शिता, जवाबदेही और स्क्रैपिंग‑ऑफ़ को रोकने के लिये संस्थागत तंत्र को सुदृढ़ करना चाहिए। इस दिशा में कदम उठाने से न केवल घरेलू कृषि क्षेत्र की स्थिरता बनी रहेगी, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की आर्थिक नीति की विश्वसनीयता भी बढ़ेगी।
Published: May 7, 2026