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मध्य‑पूर्व संघर्ष के बाद भारत के ऊर्जा, उर्वरक और रक्षा आपूर्ति श्रृंखला में तीन प्रमुख अवसर

पिछले कुछ हफ्तों में मध्य‑पूर्व में तेज़ी से बढ़ते संघर्ष ने वैश्विक तेल‑गैस बाजार में अस्थिरता को नया रूप दिया है। भारत, जिसकी ऊर्जा उपभोग का लगभग 80 % आयात पर निर्भर है, इस झटक़े को सीधे अपनी जीवाश्म ईंधन की कीमतों और महंगाई के स्तर में परिलक्षित देख रहा है। इस परिप्रेक्ष्य में सरकार और उद्योग दोनों को अपनी सप्लाई‑चेन नीतियों का पुनः‑मूल्यांकन करना आवश्यक हो गया है।

1. ऊर्जा स्रोतों की विविधता और घरेलू उत्पादन पर तेज़ी – पारंपरिक रूप से भारत का अधिकांश कच्चा तेल और नैचुरल गैस खाड़ी देशों से आता है। अब ओएनजीसी, रिलायंस इंडस्ट्रीज और इंडियन ऑयल जैसे प्रमुख कंपनियों को गैस‑टु‑लिक्विड (GTL) और शेल‑गैस तकनीकों में निवेश बढ़ाने की सलाह दी जा रही है, ताकि मध्य‑पूर्व‑की असुरक्षा से कम प्रभावित हो सकें। साथ ही, निकट‑आसियान देशों जैसे इज़राइल व संयुक्त अरब अमीरात के साथ रणनीतिक तेल समझौते करने से त्वरित आपूर्ति सुरक्षित हो सकती है। यह कदम न केवल कीमतों में स्थिरता लाएगा, बल्कि रणनीतिक पेट्रोलियम रिज़र्व (SPR) की पूर्ति में भी मदद करेगा।

2. उर्वरक आयात से हटकर आत्मनिर्भरता की राह – मध्य‑पूर्व में कई उर्वरक उत्पादन इकाइयाँ, विशेषकर यूरिया और अमोनिया, घिसाई के कारण बंद या निर्यात बंदी का सामना कर रही हैं। इस कारण भारतीय किसान वर्ग को उर्वरक की कीमत में तेज़ वृद्धि का सामना करना पड़ रहा है, जिससे भोजन लागत बढ़ रही है। IFFCO, नेशनल फर्टिलाइज़र लिमिटेड और रसायनजगत के निजी खिलाड़ियों को अपनी उत्पादन क्षमता को 2028 तक 30 % तक बढ़ाने के लिए पूँजी एवं तकनीक सहयोग की जरूरत है। सरकारी स्तर पर उर्वरक आयात पर ड्यूटी घटाने, वैकल्पिक स्रोत जैसे दक्षिण‑अमेरिका व अफ्रीका के साथ दीर्घकालिक अनुबंध बनाने, तथा हाइड्रॉजेन‑आधारित उर्वरक प्रौद्योगिकी को प्रोत्साहित करने से दीर्घकालिक लाभ मिल सकता है।

3. रक्षा और एयरोस्पेस में स्वदेशी-विदेशी साझेदारी – मध्य‑पूर्व में भारतीय रक्षा सामान की कई एसीआर‑कोन्साइनमेंट (वास्तविक-समय संरक्षित) समझौते जोखिम में पड़ गए हैं। इससे HAL, लार्सन & टुब्रो, टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स जैसे मौजूदा डीफ़ेंस उद्यमों को वैकल्पिक आपूर्ति चैनल खोजने की जरूरत है। सरकार द्वारा लागू 'स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप' मॉडल, जिसमें विदेशी फर्मों को भारतीय डिटेलर के रूप में काम करने की अनुमति है, को तेज़ी से कार्यान्वित किया जाना चाहिए। इससे न केवल उत्पादन‑यौगिक लागत घटेगी, बल्कि स्थानीय उद्योग की तकनीकी क्षमताओं को भी बढ़ावा मिलेगा।

इन तीन क्षेत्रों में संभावनाओं की पहचान करते हुए, नीति निर्माताओं को दो प्रमुख कदम उठाने चाहिए: पहला, मौजूदा नियामकीय ढांचे को पारदर्शी बनाकर विदेशी निवेश तथा तकनीक ट्रांसफर को सुगम बनाना; दूसरा, उपभोक्ता एवं किसान वर्ग के हित को प्राथमिकता देते हुए मूल्य स्फीति को नियंत्रित करने हेतु रणनीतिक भंडारण और मूल्य स्थिरीकरण तंत्र को सुदृढ़ करना। जबकि सरकार का "आत्मनिर्भर भारत" का पुनरावर्तित भाषण नीति‑व्यावहारिक रूप से सराहनीय है, वास्तविक कार्य‑योजना में कई कड़ी‑स्थापनों की कमी दर्शायी देती है – जैसे की पेट्रोलियम मंत्रालय की लाइसेंसिंग प्रक्रिया में विलंब, उर्वरक सब्सिडी की त्रुटिपूर्ण क्रियान्वयन, तथा रक्षा खरीद में लंबी प्रोक्योरमेंट साइकल। इन खामियों को दूर करना ही भारत को वैश्विक भू‑राजनीतिक तनाव के प्रभाव से बचाने की कुंजी है।

Published: May 6, 2026