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Category: व्यापार

मध्य पूर्व तनाव के बाद सोने की कीमत में हल्की उछाल, महंगाई जोखिम बना बना

बीते सोमवार को मध्य पूर्व में दुश्मनी की तीव्रता में अचानक बढ़ोतरी के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमत लगभग 2% गिर गई। इसके बाद, डिप बायर्स – यानी कीमत गिरने के बाद खरीदारी करने वाले निवेशकों – ने फिर से कदम रखा, जिससे भारतीय रुपये में सोने की कीमत में मामूली उछाल देखा गया।

सोना भारतीय निवेशकों और रिटेल ग्राहकों के लिये हमेशा महंगाई के विरुद्ध एक सुरक्षित आश्रय रहा है। मूल्य में अस्थिरता के समय में दर्शक वर्ग इसे पोर्टफोलियो में शामिल करता है, जिससे उसकी मांग में निरंतर बढ़ोतरी होती है। इस बार, कीमत में गिरावट के बाद फिर से उछाल देखना इस बात की पुष्टि करता है कि घरेलू निवेशकों में जोखिम‑भुगतान क्षमता अभी भी मजबूत है, पर साथ ही यह महंगाई‑उच्ची माहौल का भी संकेत देता है, जहाँ उपभोक्ता समूह मुद्रास्फीति से बचाव के लिये सोना खरीदते हैं।

वित्तीय दृष्टिकोण से देखी जाए तो सोने की कीमतों में दो‑तीन प्रतिशत की परिवर्तनशीलता भारत के निर्यात‑आधारित ज्वेलरी उद्योग पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है। ज्वेलरी निर्माताओं को कच्चे माल की लागत में उतार‑चढ़ाव को संभालना पड़ता है, जिससे अंतिम उपभोक्ता को बढ़े हुए मूल्य पर उत्पाद मिलते हैं। इससे मध्यम वर्ग के रीटेल खरीदारी में कमी और मांग‑आपूर्ति असंतुलन उत्पन्न हो सकता है।

सरकारी नीतियों की बात करें तो, भारत में सोने के आयात पर उच्च सीमा शुल्क और अनुकूलित कस्टम ड्यूटी लागू है, जो अस्थायी रूप से देश में सोने की आपूर्ति में बाधा डालते हैं। यह नीति महंगाई नियंत्रण के नाम पर लागू है, परंतु जब असली महंगाई का दबाव इस धातु की कीमतों में परिलक्षित हो रहा है, तो यह कदम उपभोक्ता हित के प्रति अनिच्छा का संकेत बनता है। नियामक पर्यवेक्षक, यानी भारतीय रिज़र्व बैंक, ने भी सोने के स्टॉक को एक रणनीतिक सुरक्षा के रूप में रखा है, परन्तु RBI द्वारा सार्वजनिक रूप से महंगाई को नियंत्रण में बताया जाना और सोने की कीमतों में अनिश्चितता का कारण बनना एक विरोधाभास उजागर करता है।

बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि मध्य पूर्व में तनाव जारी रहने से वैश्विक धातु बाजार में अस्थिरता बनी रह सकती है, जिससे भारत के आयात‑निर्भर सोने के बाजार में निरंतर कीमतों में उतार‑चढ़ाव देखी जा सकती है। इस बीच, उपभोक्ता वर्ग को सावधानीपूर्वक अपना पोर्टफोलियो प्रबंधित करने की जरूरत है, क्योंकि सोना अभी भी महंगाई‑भारी माहौल में एक प्रतिबंधक साधन बना हुआ है, पर साथ ही यह निवेश जोखिम को भी बढ़ाता है।

सारांश में, मध्य पूर्व के संघर्षों से उत्पन्न मूल्य गिरावट के बाद डिप बायर्स की सक्रियता ने भारतीय सोने के बाजार को थोड़ी राहत दी, पर महंगाई के व्यापक जोखिम अभी भी कठोर बने हुए हैं। नीति‑निर्माताओं को अनावश्यक शुल्क में ढील देने और पारदर्शी महंगाई रिपोर्टिंग को सुदृढ़ करने की आवश्यकता है, ताकि निवेशकों और सामान्य जनता दोनों को आर्थिक स्थिरता का वास्तविक अनुभव हो सके।

Published: May 5, 2026