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Category: व्यापार

मध्य‑पूर्व तनाव के बीच तेल की कीमतें गिराईं, लेकिन ऊँची बनी रहीं

बीतते 24 घंटे में ब्रेंट क्रूड की कीमत लगभग 2.5 प्रतिशत गिरते हुए 84 डॉलर से नीचे पहुंच गई, जबकि अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटर्मीडिएट (WTI) 1.9 प्रतिशत गिरकर 80 डॉलर के स्तर के आसपास रह गई। इस गिरावट के बावजूद, दोनों सूचकांक पिछले दो हफ्तों के बहुलकालिक ऊपर की प्रवृत्ति से दूर नहीं हुए, जिससे समग्र रूप से तेल की कीमतें अभी भी उच्च स्तर पर बनी हैं।

कीमतों में यह अस्थायी सुधार मुख्यतः मध्य‑पूर्व में नई सैन्य टकराव की आशंकाओं के कारण हुआ, जहाँ इस क्षेत्रों में हालिया हवाई हमले और जलवायु स्थितियों ने आपूर्ति श्रृंखला में संभावित व्यवधान की चेतावनी दी। ओपेक‑प्लस समूह ने मौजूदा उत्पादन कटौती को बनाए रखने की पुष्टि की, जिससे बाजार को आगे भी सीमित सप्लाई माहौल की आशा बनी रही।

भारत के लिए इसका सीधा असर आयात बिल पर पड़ेगा। राष्ट्रीय तेल भंडारण एजेंसी (एनपीसी) के आंकड़ों के अनुसार, भारत प्रतिमाह लगभग 5.2 मिलियन बैरल कच्चा तेल आयात करता है, जिसका कुल लागत वैश्विक कीमतों के 75 प्रतिशत से ऊपर रहने पर लगभग 2.5 ट्रिलियन रुपये तक पहुँच सकता है। इस लागत में संभावित गिरावट वार्षिक बजट में 0.3 प्रतिशत तक कमी ला सकती है, परन्तु उच्च कीमतों का क्रमिक दबाव महँगाई में जोड़ देगा, विशेषकर पेट्रोल, डीजल और एटीए जैसी डीज़ल-आधारित वस्तुओं में।

रुपए की विनिमय दर भी इस पर संवेदनशील है। डॉलर के मुकाबले रुपये की मौजूदा दर 83.10 पर टिके रहने के साथ, तेल कीमतों में कोई भी तीव्र परिवर्तन विदेशी मुद्रा बाजार में असंतुलन पैदा कर सकता है, जिससे आयातकों के लिए फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स की लागत बढ़ेगी। भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) ने इस जोखिम को देखते हुए ऊर्जा‑संकट के संभावित प्रभाव को मौद्रिक नीति के पूर्वानुमान में शामिल करने की संभावना जताई है।

नियामक पहलू भी अहम है। सरकार ने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (एसपीआर) को 60 दिन की आपूर्ति को कवर करने के लिए पर्याप्त स्तर पर रखने का लक्ष्य निधारित किया है। वर्तमान में एसपीआर में 20 लाख मीट्रिक टन कच्चा तेल जमा है, जो मौजूदा कीमतों में परिवर्तनों को कुछ हद तक सोखने में मदद कर सकता है। साथ ही, ईंधन पर लागू किए गए वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) और विशेष नुकसान सामग्री कर (एसएलसी) में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है, जिससे उपभोक्ता को तत्काल मूल्य राहत नहीं मिल पाई।

कॉर्पोरेट क्षेत्र में भी इस उतार‑चढ़ाव के असर स्पष्ट हैं। भारत के प्रमुख रिफ़ाइनर – रिलायंस इंडस्ट्रीज, हिन्दुस्तान पेट्रोलियम और भारतीय तेल निगम – ने कहा है कि उन्होंने लागत‑प्रबंधन के तहत इन्वेंट्री हेजिंग रणनीतियों को मजबूत किया है, परन्तु दीर्घकालिक मूल्य स्थिरता के बिना निवेश‑परिवर्तनशीलता में संकोच बरकरार रहेगा।

उपभोक्ताओं के लिए तत्काल प्रभाव सीमित है; पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों पर अभी तक कोई सरलीकरण नहीं हुआ है। हालांकि, महंगाई के सामान्य प्रवाह में तेल की कीमतों की स्थिर उच्च सीमा दीर्घकालिक रूप से जीवनयापन लागत को बढ़ाने की संभावना रखती है, जिससे कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (सीपीआई) में अतिरिक्त दबाव बन सकता है। नीतिनिर्माताओं को ऊर्जा सुरक्षा, कीमतों की अस्थिरता और मौद्रिक स्थिरता के बीच संतुलन बनाने हेतु त्वरित उपायों पर ध्यान देना अनिवार्य रहेगा।

Published: May 5, 2026