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Category: व्यापार

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बैंक सरकार से बोले: महंगाई‑वृद्धि के मद्देनज़र किफायती आवास मानकों का पुनःनिर्धारण आवश्यक

बड़ें बैंकों ने आज प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में कहा कि वर्तमान किफायती आवास सीमा‑निर्देश जितने साल पहले तय हुए थे, वे आज की बढ़ती संपत्ति कीमतों और उधार ब्याज दरों को प्रतिबिम्बित नहीं करते। उन्होंने बताया कि जब तक इन मानकों को अद्यतन नहीं किया जाता, मध्यम‑आय वर्ग के खरीदारों के लिए गृहस्वामित्व कठिन ही बना रहेगा।

रिपो दर में लगातार दो अंकों की बढ़ोतरी और मुद्रास्फीति के कारण घरों की टिकट साइज में पिछले पाँच सालों में औसत 75% की बढ़ोतरी हुई है। फिर भी, बैंकें अभी भी 30 लाख रुपये की मूल्य सीमा और 1200 वर्ग फुट की क्षेत्रफल सीमा के भीतर ही किफायती होम लोन दे रहे हैं, जो कई शहरी और उपनगर क्षेत्रों में वास्तविक बाजार कीमतों का अदूरस्त प्रतिबिंब है।

आवासीय निर्माण एवं निर्माण सामग्री उद्योग में इस गिरावट का सीधा असर रोजगार पर पड़ रहा है। किंवदंती के अनुसार, इस वर्ष केवल 1.2 % की औसत घरों की बिक्री दर से निर्माण क्षेत्र में नई नौकरियों की सौंपी गई संभावनाएँ घट गई हैं, जिससे 1.8 लाख से अधिक श्रमिक अप्रभावित हो सकते हैं।

बैंकों ने यह भी रेखांकित किया कि नियामक संस्थाएँ — विशेषकर भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) — को किफायती आवास ऋण के लिए जारी किया गया “किफायती आवास नीति” को पुनःसमीक्षा करना चाहिए। मौजूदा दिशा-निर्देशों में ऋण‑टिकट‑आकार, मूल्य‑सीमा और प्रॉपर्टी‑साइज़ को समय‑समय पर संशोधित करने की कोई स्पष्ट प्रक्रिया नहीं है, जिससे बैंकों को जोखिम‑प्रबंधन के साथ-साथ सामाजिक दायित्व भी पूरा करने में दोधारी तलवार का सामना करना पड़ता है।

वित्तीय संस्थानों की आशंका यह भी है कि अगर कीमत‑सीमाएँ न बदलीं, तो ग्राहक‑डिफॉल्ट रेट में वृद्धि हो सकती है। उच्च ब्याज लागत के साथ, ग्राहकों की पुनर्भुगतान क्षमता सीमित हो रही है, जिससे गैर‑परिचालन परिसंपत्तियों (NPA) के स्तर में इज़ाफ़ा हो सकता है। इस परिप्रेक्ष्य में, बैंकों ने नीति‑निर्माताओं से अनुरोध किया कि वे मूल्य‑सीमा को वर्तमान बाजार मूल्यों के अनुरूप, संभवतः 70 % तक बढ़ाकर, और इमारत‑आकार सीमा को 1500‑2000 वर्ग फुट के दायरे में पुनःनिर्धारित करें।

उपभोक्ता पक्ष के लिए यह कदम महत्त्वपूर्ण होगा। यदि किफायती आवास की परिभाषा री-डिफाइन की जाती है, तो न केवल गृहस्वामी बनना अधिक सुलभ होगा, बल्कि घर खरीदने की प्रक्रिया में संभावित बैंकरूपी प्री‑फ़िनांसिंग लागत भी घटेगी। इसके साथ ही, घर बनाने वाले ठेकेदारों और रीयल एस्टेट एजेंटों के लिए भी माँग में संभावित वृद्धि हो सकती है, जिससे आर्थिक चक्र में पुनःस्पंदन देखने को मिल सकता है।

निष्कर्षतः, बैंकों की यह माँग सिर्फ वित्तीय जोखिम को कम करने की नहीं, बल्कि आर्थिक विकास, रोजगार सृजन और उपभोक्ता कल्याण को संबल देने की भी है। नीति‑निर्माताओं को वर्तमान महंगाई, ब्याज दरों और बाजार मूल्यों को साथ लेकर किफायती आवास की परिभाषा को पुनःसंकल्पित करना चाहिए, अन्यथा निचले‑और‑मध्यम‑आय वर्ग के घर‑खरीदी में बाधा उत्पन्न होती रहेगी।

Published: May 9, 2026