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Category: व्यापार

फ़ेशियल पहचान प्रणाली की गलती से ग्राहकों को बाहर निकालना: भारतीय रिटेल में नियामक चूक और उपभोक्ता जोखिम

पिछले महीने कई बड़े शहरों के सुपर‑मार्केट और इलेक्ट्रॉनिक स्टोर्स में ग्राहकों को फुटपाथ पर बाहर निकाल दिया गया, जब उनका चेहरा गलत ढंग से पहचानकर उन्हें संदेहजनक बताया गया। प्रभावित शॉपर्स ने बताया कि उन्हें बिना कारण ‘कुर्सी खाली करें’ या ‘दुकान तुरंत छोड़ें’ का आदेश मिल गया, जबकि स्टोर प्रबंधन ने कोई स्पष्ट स्पष्टीकरण या मदद नहीं की। यह घटना तकनीकी त्रुटियों और नियामक ढांचे की कमी को उजागर करती है, जो उपभोक्ता विश्वास और रिटेल क्षेत्र की आय दोनों को प्रभावित कर सकती है।

फ़ेशियल पहचान (FR) प्रणाली का उपयोग अब भारत के कई बड़े रिटेल चेन में सुरक्षा, अनुदान और ग्राहक अनुभव को बेहतर बनाने के नाम पर बढ़ रहा है। परन्तु, वर्तमान में इस तकनीक की निगरानी के लिए कोई एकीकृत नियम नहीं है। जबकि राष्ट्रीय डेटा संरक्षण बिल (PDPB) के मसौदे में व्यक्तिगत डेटा के उपयोग के लिये स्पष्ट अनुबंध और परिपत्र की बात हो रही है, उनमें फ़ेशियल बायोमेट्रिक डेटा की विशिष्ट प्रावधान अभी तक नहीं जुड़े हैं। परिणामस्वरूप, कंपनियों को परिप्रेक्ष्य‑गहन डेटा सुरक्षा सिद्धांतों का पालन करने की आवश्यकता है, परंतु वास्तविक नियंत्रण और उत्तरदायित्व स्थापित करने में अंतराल बना हुआ है।

आर्थिक दृष्टिकोण से देखा जाये तो, रिटेल सेक्टर में प्रतिवर्ष लगभग ₹5 लाख करोड़ का अनुमानित राजस्व है। ऐसी अनुचित पहचान की घटनाएँ उपभोक्ता भरोसे को क्षीण कर, स्टोरों के भीतर खर्च घटाने और ऑनलाइन प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने की संभावनाएँ रखती हैं। विशेषकर मध्यम वर्ग के वही ग्राहक, जो किराना और दैनिक उपयोगी सामान पर निर्भर होते हैं, एक बार नकारात्मक अनुभव के बाद उसी ब्रांड या शॉपिंग मॉल से दूर हो सकते हैं। इससे न केवल स्थानीय रोजगार पर असर पड़ेगा, बल्कि विक्रेताओं और आपूर्तिकर्ताओं के लिए भी अस्थिरता उत्पन्न होगी।

नियामक निकायों ने इस मुद्दे पर कई बार चेतावनी जारी की है। उपभोक्ता मामलों के राष्ट्रीय आयोग (NCC) ने कहा कि बायोमेट्रिक डेटा के दुरुपयोग से उपभोक्ता अधिकारों का उल्लंघन हो सकता है और कंपनियों को त्वरित सुधारात्मक कदम उठाने चाहिए। साथ ही, भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम की धारा 43ए के तहत डेटा सुरक्षा उल्लंघन पर दण्ड का प्रावधान मौजूद है, परंतु इस अनुशासन को लागू करने के लिये स्पष्ट प्रक्रियात्मक मार्गदर्शन अभी तक नहीं दिया गया।

उपभोक्ता समूहों ने स्टोर प्रबंधन से स्पष्ट मांग की है: पहचान त्रुटियों के लिये तत्काल शिकायत निपटान प्रोटोकॉल, पुनः जाँच के लिये स्वतंत्र ऑडिट और प्रभावित ग्राहक को आर्थिक एवं मानवीय क्षतिपूर्ति। मौजूदा स्थिति में कई शॉपर्स ने स्वयं कानूनी कदम उठाने या हाई कोर्ट में याचिकाएँ दायर करने का विकल्प चुना, जिससे न्यायिक बोझ और व्यय दोनों बढ़ रहे हैं।

रिटेल कंपनियों के लिये यह एक चेतावनी संकेत है कि तकनीकी नवाचार को नियामक अनुपालन के साथ संतुलित किया जाये। उद्योग संघों ने सुझाव दिया है कि फ़ेशियल पहचान के लिए मानकीकृत एल्गोरिदम, त्रुटि दर को कम करने के लिए निरंतर प्रशिक्षण और पारदर्शी डेटा संग्रह‑भंडारण नीति अपनायी जाये। इसके साथ ही, सरकार को निकट भविष्य में डेटा संरक्षण बिल में बायोमेट्रिक डेटा के लिये विशेष प्रावधान जोड़ने और एक स्वतंत्र निगरानी निकाय स्थापित करने की आवश्यकता है।

जब तक इस तरह की नियामक चूकों को समाप्त नहीं किया जाता, भारतीय रिटेल बाजार को उपभोक्ता विश्वसनीयता के नकारात्मक प्रभाव का सामना करना पड़ेगा, और आर्थिक दृष्टि से इसका दीर्घकालिक नुकसान हो सकता है। उपभोक्ता सुरक्षा को सुदृढ़ करने के लिये तकनीकी विकास, नियामक नियंत्रण और कॉर्पोरेट उत्तरदायित्व के बीच संतुलन स्थापित करना अनिवार्य है।

Published: May 3, 2026