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Category: व्यापार

नए श्रम कोड से ग्रैच्युटी में बढ़ोतरी, नेट वेतन में गिरावट

भारत सरकार द्वारा 1 मई 2026 को लागू किए गए नए श्रम कोड ने वेतन संरचना में मूलभूत परिवर्तन किए हैं। मौजूदा नियमों की जगह अब वेतन के बेसिक घटक को बढ़ा कर प्रोविडेंट फंड (PF) तथा ग्रैच्युटी के आधार के रूप में निर्धारित किया गया है। इस बदलाव के कारण नियोक्ताओं को statutory योगदान में वृद्धि करनी पड़ रही है, जिससे कर्मचारियों की टेक-होम सैलरी पर दबाव बना है।

नियम के अनुसार, PF की दर 12% से 15% तक उठाई जा सकती है, जबकि ग्रैच्युटी का योगदान बेसिक वेतन का लगभग 4.81% हो गया है। अब जब बेसिक घटक को कुल वेतन की 50% तक बढ़ाया गया है, तो इन दोनों प्रतिबद्धताओं का कुल भार 20% से अधिक हो सकता है, जिससे नेट वेतन में औसतन 5%‑7% की गिरावट दर्ज की गई है। मध्यम आय वर्ग के कर्मचारियों की खरीद शक्ति के लिए यह कमी खासा नुकसानदेह है, क्योंकि मौजूदा महंगाई के माहौल में वास्तविक आय में गिरावट का सीधा असर उपभोक्ता खर्च पर पड़ेगा।

कॉरपोरेट प्रतिक्रिया के मामले में कंपनियों ने अलग‑अलग उपाय अपनाए हैं। सैप इंडिया ने अपने कर्मचारियों के लिए सैलरी बफ़र योजना के तहत अतिरिक्त मोबिलिटी अलाउंस और वार्षिक बोनस के रूप में पूरक प्रदान करके शुद्ध वेतन को स्थिर रखने का दावा किया है। इसके अलावा, कई कंपनियाँ वेरिएबल पे या परफॉर्मेंस बाउंटी को बढ़ा कर असल टेक‑होम को संतुलित करने की कोशिश कर रही हैं। लेकिन यह उपाय केवल एक अस्थायी राहत है, क्योंकि statutory योगदान में आए स्थायी वृद्धि का बकाया अब कंपनी के स्थायी खर्च के हिस्से में शामिल हो गया है।

न्यायिक और नियामक संदर्भ में देखा जाए तो यह कोड का उद्देश्य कर्मचारियों के सामाजिक सुरक्षा कवरेज को मजबूत करना है, परन्तु इसे कार्यान्वयन के समय आर्थिक स्थितियों, विशेषकर वर्तमान में चल रही महंगाई एवं रोजगार प्रवाह को पर्याप्त रूप से नहीं माना गया। सरकार ने कहा है कि यह सुधार “व्यापार सुगमता” और “कर्मचारी कल्याण” दोनों को एक साथ साकार करेगा, पर वास्तविकता में वेतन की कटौती से घरेलू खरीद शक्ति घटाने की संभावना है, जो आर्थिक विकास को उलट सकता है।

बाजार की दृष्टि से, श्रम लागत में वृद्धि का प्रतिफल शेयर बाजार में मेटल, आईटी और सेवा क्षेत्रों की कंपनियों के शेयरों में अस्थायी दबाव के रूप में दिख रहा है। इन कंपनियों को आगे चलकर कर्मचारियों को प्रतिपूर्ति करने हेतु अतिरिक्त पूँजी आवंटन करना पड़ सकता है, जिससे निवेशकों की रिटर्न अपेक्षाएँ पुनः समायोजित हो सकती हैं।

समग्र रूप से, नई श्रम कोड वाकई में कर्मचारियों के भविष्य सुरक्षा को बढ़ावा देती है, परन्तु इस उन्नत सुरक्षा की कीमत आज के वेतनभोगी वर्ग पर बहुत तेज़ी से आ रही है। नीति निर्माताओं को चाहिए कि वे इस संतुलन को पुनः जांचें और कंपनियों तथा श्रमिकों के बीच असमानता को कम करने के लिए अतिरिक्त मुआवजा उपाय, जैसे कि कर रियायत या अभ्यस्त छूट, पेश करें। तभी इस सुधार को सच्चे अर्थ में “सभी के लिए विकास” कहा जा सकता है।

Published: May 4, 2026