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Category: व्यापार

नौकरी छोड़ने की दर स्थिर, श्रम बाजार में गहरी असहजता का संकेत

पिछले महीनों में भारत के श्रम बाजार में एक असामान्य रुख देखे जा रहे हैं। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इन्डियन इकोनॉमी (CMIE) के नवीनतम डेटा के अनुसार, प्रथम तिमाही 2026 में नौकरी छोड़ने (क्विट) की दर केवल 2.2 % रही, जो साल‑दर‑साल 2.8 % से नीचे गिरा है। यह गिरावट कई अर्थशास्त्रियों को आश्चर्यचकित कर रही है, क्योंकि रोजगार सृजन के बावजूद कार्यस्थल पर तनाव, उच्च महंगाई और वेतन में सुधार की कमी की रिपोर्टें लगातार सामने आ रही हैं।

इस परिप्रेक्ष्य में दो मुख्य कारण प्रकाश में आते हैं। पहला, कुल जनसंख्या में सक्रिय श्रमिकों का अनुपात अभी भी 68 % से नीचे बना हुआ है, जिससे नौकरियों के प्रतिस्पर्धी बाजार में नौकरी छोड़ना आर्थिक जोखिम बन जाता है। दूसरा, वास्तविक वेतन में गिरावट ने कर्मचारियों को विकल्पों की खोज से हतोत्साहित किया है। भारत सरकार के प्लेटफॉर्म ‘वेतन भण्डार’ के आंकड़े दिखाते हैं कि 2025‑26 में औसत वेतन वृद्धि 6.1 % रही, जबकि मुद्रास्फीति 8.3 % तक पहुँच गई, जिससे वास्तविक आय में कमी आई है।

कॉर्पोरेट जगत ने इस प्रवृत्ति को रोकने के लिए विविध रणनीति अपनाई है। कई बड़ी कंपनियों ने ‘रिटेंशन बोनस’ और ‘हाइब्रिड वर्क मॉडल’ पेश किए हैं, लेकिन ये उपाय अस्थायी लगते हैं। वित्तीय वर्ष 2025‑26 में सर्वेक्षण किए गए 120 शेयर‑सूची कंपनियों में से केवल 22 % ने वेतन वृद्धि से ऊपर कोई विशेष प्रोत्साहन प्रदान किया, जिससे श्रमिक वर्ग में असंतोष बढ़ने की संभावना बनी रहती है।

नियामकीय संदर्भ भी इस चित्र को पूर्ण करता है। हाल ही में लागू हुए श्रम संहिता में भर्ती एवं निकासी प्रक्रियाओं को सरल बनाया गया, परन्तु वेतन नियमन एवं सामाजिक सुरक्षा कवरेज के मुद्दों को पर्याप्त रूप से संबोधित नहीं किया गया। इस कारण, कंपनियों के लिए लागत घटाने की दिशा में प्रोत्साहन बढ़ा है, जबकि श्रमिकों के हितों की रक्षा में अंतराल बना रह गया है।

उपभोक्ता पक्ष पर भी इस रुझान का असर स्पष्ट है। नौकरी छोड़ने की दर में गिरावट का अर्थ यह हो सकता है कि श्रमिक नौकरी की असुरक्षा के कारण खर्च में कटौती कर रहे हैं, जिससे घरेलू मांग में धीमी गति देखने को मिल रही है। रिटेल डाटा प्रदाता एंट्रीसेंस के अनुसार, किराने की वस्तुओं की संगत वर्ष‑दर‑साल बिक्री 1.9 % घट गई, जबकि आयुषी वस्तुओं की बिक्री में मामूली बढ़ोतरी देखी गई।

नीति‑निर्णेताओं के लिए यह एक स्पष्ट संकेत बनता है कि केवल रोजगार के आँकड़े दिखाने से पर्याप्त नहीं है; वास्तविक वेतन बढ़ोतरी, सामाजिक सुरक्षा और कौशल विकास को प्राथमिकता देना आवश्यक है। ‘स्किल इंडिया’ एवं ‘डिजिटल साक्षरता’ कार्यक्रमों की प्रभावशीलता का पुनर्मूल्यांकन, तथा श्रमिक वर्ग के लिए उचित वेतन संरचना तैयार करना, भविष्य में नौकरी छोड़ने की दर को स्वस्थ स्तर पर लाने में मददगार सिद्ध हो सकता है।

संक्षेप में, नौकरी छोड़ने की दर में गिरावट केवल एक आकड़ात्मक गिरावट नहीं, बल्कि आर्थिक असहजता, कम वास्तविक आय और नियामकीय चुनौतियों का प्रतिबिंब है। यदि इस प्रवृत्ति को ठीक से नहीं समझा गया तथा उपयुक्त नीति‑सुधार नहीं किए गये, तो भारत की दीर्घकालिक उत्पादन क्षमता और उपभोक्ता शक्ति दोनों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

Published: May 5, 2026