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Category: व्यापार

जेरोम पॉवेल के फेड बोर्ड में रीयुक्त रहने के फैसले पर टिम स्कॉट ने 'गंभीर गलती' का एशारा किया

संयुक्त राज्य अमेरिका के मौद्रिक नीतिकर्ता जे.ए. पॉवेल ने 31 मार्च को अपने फेडरल रिजर्व चेयरपर्सन के कार्यकाल का समापन होते ही फेड के बोर्ड सदस्य के रूप में सेवा जारी रखने का इरादा व्यक्त किया। इस घोषणा पर रिपब्लिकन शासक टिम स्कॉट ने इसे "गंभीर नीति‑गलती" कहा, क्योंकि वे मौद्रिक नीतियों में निरंतरता और स्वतंत्रता को लेकर चिंतित हैं।

पॉवेल के इस कदम का मुख्य आर्थिक प्रभाव अमेरिकी ब्याज दरों, मुद्रा बाजार और बंधक दरों पर पड़ने की संभावना है। फेड के भीतर निरंतरता का संकेत निवेशकों को अस्थिरता से बचा सकता है, परन्तु यह भी सवाल खड़ा करता है कि मौजूदा महंगाई के दबाव को नियंत्रित करने हेतु बोर्ड में नई सोच की आवश्यकता नहीं रहेगी। टिम स्कॉट का मानना है कि बोर्ड में ही दोहराव वाली नीति दृष्टिकोण से पुनरावृत्तियों और संभावित नीति‑भ्रम उत्पन्न हो सकते हैं।

भारत की अर्थव्यवस्था और वित्तीय बाजारों के लिए यह विकास अप्रत्यक्ष रूप से महत्वपूर्ण है। अमेरिकी ब्याज दरों में स्थिरता के साथ, भारतीय रुपये की कीमत में संभावित तटस्थता या थोड़-बहुत अस्थिरता देखी जा सकती है। फेड के इस निरंतर नेतृत्व से अंतरराष्ट्रीय पूंजी प्रवाह में स्थिरता बनी रहने की संभावना है, जिससे भारतीय इक्विटी और बांड बाजारों में अनिच्छा रहित निवेश कारक बना रह सकता है। वहीं, यदि फेड का मौद्रिक धोखा जारी रहता है और महंगाई दर में पुनः वृद्धि होती है, तो भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) को मौद्रिक नीतियों में अधिक सख्त कदम उठाने पड़ सकते हैं।

नीतिगत संदर्भ में, फेडरल रिजर्व की इस तरह की संरचनात्मक निरंतरता को कुछ अर्थशास्त्री "संकल्पनात्मक लचीलापन" की कमी के रूप में देखते हैं। भारतीय नियामक ढांचे में, जहां RBI को अक्सर केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता को चुनौती देने वाले राजनैतिक दबावों से बचना पड़ता है, इस तरह का मॉडल दोनों पक्षों को विचारशील बनाता है। हालांकि, अगर फेड के निर्णयों में विविधता न हो तो वह वैश्विक वित्तीय स्थिरता को जोखिम में डाल सकता है, जिससे भारतीय उपभोक्ताओं पर भी असर पड़ेगा—उच्च मुद्रास्फीति, उच्च ऋण लागत और उपभोक्ता खर्च में गिरावट जैसी संभावनाएं।

सारांश में, जेरोम पॉवेल का फेड बोर्ड में रीयुक्त रहना अमेरिकी मौद्रिक नीति की निरंतरता का संकेत देता है, परन्तु यह भी सवाल उठाता है कि इस निरंतरता से आर्थिक लचीलापन और नीति नवाचार पर क्या प्रतिबंध लगेंगे। टिम स्कॉट की आलोचना इस बात को उजागर करती है कि व्यक्तिगत निर्णयों के बजाए संस्थागत परिवर्तन की आवश्यकता है। भारतीय निवेशकों और नीति निर्माताओं को इस विकसित परिदृश्य को बारीकी से देखना होगा, क्योंकि वैश्विक मौद्रिक दिशा में परिवर्तन सीधे भारतीय रुपये, बांड रिटर्न और उपभोक्ता कीमतों को प्रभावित कर सकते हैं।

Published: May 5, 2026