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Category: व्यापार

जियो-राजनीतिक तनाव के कारण नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश में पाँच साल का सर्वाधिक प्रवाह

पश्चिम एशिया में इज़रान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच तेज़ी से बढ़ते सैन्य तनाव ने वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा को पुनः प्रश्नवाचक बना दिया है। इस अस्थिरता के प्रत्यक्ष परिणामस्वरूप अंतरराष्ट्रीय निवेशकों ने सुरक्षित, दीर्घकालिक रिटर्न प्रदान करने वाले नवीकरणीय ऊर्जा सेक्टर में बड़े पैमाने पर पूँजी आकर्षित की है। भारतीय नवीकरणीय फंडों ने इस वर्ष लगभग $20 अरब की नई शुद्ध प्रवाह दर्ज की, जो पिछले पाँच वर्षों में सबसे अधिक है।

इन प्रवाहों का अधिकांश हिस्सा सौर और पवन परियोजनाओं के विकास, हाइड्रोजन और बैटरियों जैसी ऊर्जा भंडारण तकनीकों में गया है। प्रमुख भारतीय कंपनियाँ जैसे अदानी ग्रीन एनर्जी, टाटा पावर और रीएन्यू ने क्रमशः बड़े ग्रीन बॉण्ड जारी करके अतिरिक्त फंडिंग प्राप्त की। अदानी ने हाल ही में $2 अरब के ग्रीन बॉण्ड जारी कर अपनी सौर क्षमता को 10 GW तक बढ़ाने की योजना को तेज किया, जबकि टाटा पावर ने दक्षिणी भारत में 3 GW की पवन क्षमता के लिए निजी‑संपत्ति भागीदारी (PPP) मॉडल अपनाया।

इन निवेशों से जुड़े आर्थिक प्रभाव बहुपक्षीय हैं। सबसे पहले, ग्रीन बॉण्ड और फिर से जारी किए गए पुनर्नवीनीकरण योग्य एसेट‑बैक्ड सिक्योरिटीज़ ने भारतीय बांड मार्केट में तरलता बढ़ायी है, जिससे राष्ट्रीय वज़न वाले बैंकों की पोर्टफोलियो में स्थायित्व आया। द्वितीय, बड़े पैमाने पर नवीकरणीय क्षमता की स्थापना से राष्ट्रीय ग्रिड में अक्षय आपूर्ति का प्रतिशत बढ़ेगा, जो दीर्घकालिक रूप से कोयला‑आधारित महँगाई‑सहनीय बिजली दरों को दबाने की संभावना रखता है। तीसरे, इस पूँजी प्रवाह ने निर्माण‑स्थल पर लगभग 1.2 लाख नई नौकरियों का सृजन किया, जिससे रोजगार‑संकट के समय में उपभोक्ता कल्याण में सकारात्मक असर पड़ेगा।

परंतु नीति‑परिसर में कुछ विरोधाभास भी स्पष्ट हैं। ऊर्जा सुरक्षा पर बल देने वाले सरकारी बयानों के बावजूद, रिन्युएबल पर्चेज़ ऑब्लिगेशन (RPO) के लक्ष्य को पूर्ण करने हेतु राज्य‑स्तर की नीलामियों में कई बार देरी होती रही है, जिससे प्रोजेक्ट कॉस्ट‑ओवररन बढ़ता है। साथ ही, हाल ही में कुछ उभरे नियमों ने विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) पर लचीलापन घटा दिया है, जो अंतरराष्ट्रीय पूँजी के दीर्घकालिक प्रवाह को अस्थिर कर सकता है। कंपनियों द्वारा पर्यावरणीय एवं सामाजिक मानकों की अनुपालन में लापरवाही के उदाहरण भी सामने आए हैं, जिससे कॉर्पोरेट जवाबदेही पर प्रश्न उठे हैं।

उपभोक्ता हित के दृष्टिकोण से, नवीकरणीय ऊर्जा की बढ़ती भागीदारी संभावित रूप से बिजली बिल में स्थिरता लाएगी, लेकिन यह तभी संभव है जब नियामक स्तर पर सब्सिडी एवं प्राइस‑कैप नीतियों को कुशलता से लागू किया जाए। यदि सरकारी घोषणा‑ओं में स्पष्ट कार्य‑योजना का अभाव बना रहा, तो निवेशकों के विश्वास में गिरावट और प्रोजेक्ट देरी की संभावना बढ़ेगी। इस परिप्रेक्ष्य में, ऊर्जा सुरक्षा के दावे को मात्र भू‑राजनीतिक कारणों से नहीं, बल्कि संरचनात्मक बाजार सुधार, पारदर्शी मूल्य निर्धारण और कड़े पर्यावरणीय मानकों से समर्थन देना आवश्यक है।

Published: May 3, 2026