जेट फ्यूल की कीमत में दुगुनी उछाल: भारतीय हवाई यात्रा पर आर्थिक धक्का और सतत ईंधन की दिशा
पिछले कुछ महीनों में, इरान पर युद्ध और होर्मुज़ जलडमरूमध्य के बहिष्करण के कारण वैश्विक जेट फ्यूल की कीमत लगभग दो गुना हो गई है। यह बढ़ोतरी केवल अंतरराष्ट्रीय बाजार तक सीमित नहीं रही; भारत जैसे बड़े तेल-आयातक देशों के लिए भी आयात लागत में तीव्र वृद्धि का कारण बनी है।
भारत विश्व का पाँचवाँ सबसे बड़ा एवीएशन बाजार है, लेकिन घरेलू जेट फ्यूल का लगभग ९० % आयात पर निर्भर करता है। स्ट्रेट‑ऑफ़‑हॉर्मुज़ के लिए तेल के परिवहन मार्ग में बाधा के साथ, प्रमुख आपूर्ति देशों से शिपिंग शुल्क एवं बीमा प्रीमियम में भी उछाल आया, जिससे लिटर‑प्रति‑लीटर लागत में दो‑तीन प्रतिशत की अतिरिक्त बढ़ोतरी हुई। इस उछाल को सीधे एयरलाइन के संचालन खर्च में परिलक्षित किया गया है।
प्रमुख भारतीय एयरलाइनों – इंडिगो, एयर इंडिया, विंडोयर आदि – ने पहले ही अपने साल‑दर‑साल शुल्क संरचना में १०‑१५ % की वृद्धि की घोषणा की है। टिकट मूल्य में बढ़ोतरा, इष्टतम लाभ मार्जिन की कमी, और संभावित उड़ान रद्दीकरण से पर्यटन, होटल व रेस्तरां जैसे परोक्ष क्षेत्रों में रोज़गार पर भी असर पड़ता दिख रहा है। अप्रैल‑मई के अंत में राष्ट्रीय पर्यटन संघ ने बताया कि विदेशी आगंतुकों की यात्रा योजना में ७‑८ % की गिरावट की संभावना है, जिसका मुख्य कारण बढ़ी हुई यात्रा लागत माना गया।
वित्तीय दृष्टि से देखे तो, कई एयरलाइन कंपनियों द्वारा जारी किए गए तिमाही परिणामों में ऑपरेटिंग कैशफ़्लो में कमी, और भविष्य के ईंधन मूल्य जोखिम को कवर करने हेतु हेजिंग खर्च में वृद्धि स्पष्ट है। कुछ कंपनियों ने विदेशों में अधिक ईंधन हेजिंग अनुबंधों को सक्रिय करने का संकेत दिया, परन्तु भारत में अभी तक स्पष्ट नियामक दिशा‑निर्देश या कर‑राहत नहीं मिलने के कारण इस रणनीति को अपूर्ण माना जा रहा है।
इन आर्थिक दबावों के बीच, सतत एवीएशन (सस्टेनेबल एव्हिएशन फ्यूल – SAF) की ओर बदलाव को तेज करने का माहौल बन रहा है। राष्ट्रीय एवीएशन नीति २०२५ में २०३० तक जेट‑शून्य (Jet‑Zero) लक्ष्य निर्धारित किया गया है, जिसमें कुल जेट फ्यूल का कम से कम ३० % SAF होना चाहिए। परन्तु वर्तमान में SAF की कीमत पारंपरिक जेट फ्यूल से दो‑तीन गुना अधिक है, और भारत में SAF उत्पादन हेतु आवश्यक बायो‑मास उपलब्धता तथा अंत‑तंत्र की कमी अभी भी बड़ी चुनौती है।
सरकारी दृष्टिकोण में, संचलन मंत्रालय नेStrategic Petroleum Reserve (SPR) के विस्तार की घोषणा की थी, परंतु जेट फ्यूल का आकार‑व्यापी स्टॉक‑पाइलस केवल ६०‑दिवसीय आपूर्ति तक सीमित है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्तर अंतरराष्ट्रीय बाजार की अस्थिरता को कवर करने में अपर्याप्त है, विशेषकर जब आपूर्ति‑श्रृंखला में दीर्घकालिक बाधा बनी हुई है। इसी संदर्भ में, डीकाबिनाइज़र कार्बन टैक्स और SAF के लिए कर‑राहत जैसे प्रस्तावित उपायों को लागू करने की गति को लेकर उद्योग को और अधिक स्पष्टता की आवश्यकता है।
उपभोक्ता पक्ष पर भी असर महसूस किया जा रहा है। उच्च किराये के कारण मध्यम वर्ग के यात्रा आदतों में परिवर्तन की संभावना है, जिससे घरेलू पर्यटन एवं एरलाइनों की सीट लोड फ़ैक्टर घटने की आशंका है। यह गिरावट न केवल एयरलाइन की राजस्व को बल्कि हवाई अड्डा एवं लैंडिंग‑एंड‑टेकऑफ़ (LAT) सेवाओं से जुड़ी नौकरियों को भी प्रभावित करेगी।
संक्षेप में, जेट फ्यूल की कीमत में दुगुनी उछाल ने भारतीय एवीएशन क्षेत्र को तत्काल वित्तीय तनाव में डाल दिया है, साथ ही सतत ईंधन एवं प्रौद्योगिकी की आवश्यकता को तेज गति से सामने लाया है। यदि नियामक एवं सरकारी संस्थाएँ स्पष्ट हेजिंग फ्रेमवर्क, SAF‑सहायता और रणनीतिक रेज़रवोयर नीति को शीघ्र लागू कर दें, तो इस संकट को दीर्घकालिक परिवर्तन कीं पैंट्री में बदलने की संभावना बढ़ेगी। वर्तमान में, आर्थिक प्रभाव को कम करने के लिये अल्पकालिक मूल्य नियंत्रण व पर्यटन समर्थन उपायों की आवश्यकता है, जबकि दीर्घकालिक रूप से जेट‑शून्य लक्ष्य की दिशा में निवेश को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
Published: May 6, 2026