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चीन की केंद्रीय बैंक की खरीद और हॉर्मुज में नए झड़पों के बीच सोने की कीमत में तेज़ी
बीते हफ्ते अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों में उल्लेखनीय उछाल देखी गई। इस उछाल के मुख्य कारण दो स्तम्भों को देखा गया – चीन के केंद्रीय बैंक द्वारा बड़ी मात्रा में सोने की खरीद और मध्य‑पूर्व में हॉर्मुज जलसेले के कारण नवउत्पन्न भू‑राजनीतिक जोखिम। दोनों कारक ने वैश्विक निवेशकों को सालाना सुरक्षित आश्रय के रूप में सोने की ओर आकर्षित किया, जिससे भारत के सोने के बाजार में भी तेज़ी आई।
चीन की केंद्रीय बैंक (पीपुल्स बैंक्स) ने आधे वर्ष में अपने सोने के भंडार में लगभग 5,000 टन की वृद्धि की घोषणा की, जो 2025‑2026 की अवधि में सबसे बड़ी खरीद में से एक है। इस ख़रीदारी ने अंतरराष्ट्रीय बैंकों के बीच सोने की माँग को पुनः सक्रिय किया और कीमतें 2% से अधिक बढ़ी। भारत में सोने के आयात पर इसका असर दो गुना है: एक ओर आयात‑ड्यूटी भरने वाली विदेशी मुद्रा उपयोग में वृद्धि होती है, और दूसरी ओर घरेलू उपभोक्ताओं के लिये ज़्यादा कीमतें महँगी होती हैं, जिससे सोने की मौद्रिक माँग पर दबाव बढ़ता है।
हॉर्मुज जलसेले, जो इराक‑ईरान के बीच नौसैनिक टकराव के रूप में उभरे, तेल की कीमतों में भी उतार‑चढ़ाव लाते हैं। तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के साथ मुद्रास्फीति के दोहरे खतरे उत्पन्न होते हैं – ख़ासकर भारत जैसी तेल आयात‑निर्भर अर्थव्यवस्थाओं में। तेल की कीमतों के बढ़ने से परिवहन लागत और उत्पादन लागत दोनों में वृद्धि होती है, जिससे वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के तहत सोने की कीमत पर भी अप्रत्यक्ष असर पड़ता है। इस संदर्भ में, सोने की कीमतों में हुई बढ़त को महंगाई के लिए एक ‘भविष्यवाणी संकेतक’ माना जा रहा है।
भारत में मौद्रिक नीति की दिशा पर इन दोनों कारकों का मिश्रित प्रभाव स्पष्ट है। भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) के पास दो विकल्प हैं: या तो दरें बढ़ाकर महंगाई को काबू में रखने की कोशिश करेगा, या अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों के उतार‑चढ़ाव को देखते हुए मुद्रा की स्थिरता को प्राथमिकता देगा। इसके साथ ही, सरकार द्वारा निर्यात‑आधारित सोने के आयात पर लगाए गए कस्टम ड्यूटी और गोदाम शुल्क में कोई ढील नहीं आई है, जिससे आयात‑केंद्रीत उपभोक्ता वर्ग को अतिरिक्त बोझ झेलना पड़ रहा है।
उपभोक्ता हित के दृष्टिकोण से, सोने की कीमत में निरंतर वृद्धि भारतीय घरों पर दो पहलुओं में असर डालती है। पहली, सोने को सांस्कृतिक निवेश के साधन के रूप में रखने वाले मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए वास्तविक रिटर्न घटता है, क्योंकि कीमतें लगातार ऊपर जा रही हैं और खरीदारी के लिए नकदी प्रवाह तनावपूर्ण हो जाता है। दूसरी, झपकी मारने वाले निवेशकों के लिये यह अवसर बनता है, जिससे बुलबुले की संभावनाएं बढ़ती हैं। नियामक संस्थाओं को इन प्रवृत्तियों पर करीबी निगरानी रखनी चाहिए, ताकि आवेगी खरीद‑बिक्री से उत्पन्न संभावित बाजार अस्थिरता को रोका जा सके।
सारतः, चीन की केंद्रीय बैंक की बड़ी खरीद और हॉर्मुज में भू‑राजनीतिक अनिश्चितता ने सोने की कीमत को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया है, जिससे भारतीय आयात, महँगाई और मौद्रिक नीति पर बहुआयामी दबाव उत्पन्न हुआ है। दिशा-निर्देशित नीतिगत कदम — जैसे आयात‑ड्यूटी पर वैकल्पिक ढाँचे, मौद्रिक स्थिरता को संतुलित करने वाले ब्याज दर नीति, और निवेशकों के लिए जोखिम‑सचेत जागरूकता अभियान — अब आवश्यक प्रतीत होते हैं, ताकि आर्थिक स्थिरता और उपभोक्ता सुरक्षा दोनों को संधारित किया जा सके।
Published: May 8, 2026