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गरीब देशों की ऋण सेवा में कटौती से सालाना $900 अर्ब विकास के लिए मुक्त
संयुक्त राष्ट्र महासचिव को प्रस्तुत एक नई रिपोर्ट के अनुसार, विकास वित्त अंतर्राष्ट्रीय (DFI) ने विश्व के सबसे वंचित 77 राष्ट्रों (G77) की ऋण सेवा पर भार को घटाकर वार्षिक $900 अर्ब (लगभग ₹7.5 लाख करोड़) विकास के लिए मुक्त करने की संभावना दर्शायी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन देशों को वर्तमान में वर्ष‑भर में लगभग $8 ट्रिलियन (₹67 लाख करोड़) का ऋण‑सेवा खर्च करना पड़ता है, जिससे सामाजिक सेवाएँ, स्वास्थ्य और बुनियादी ढाँचा गैप लगातार बढ़ रहा है।
वर्तमान में G77 के अधिकांश सदस्य देशों की झटका‑आधारित अर्थव्यवस्थाएँ उच्च स्तर के बाहरी ऋण, कच्चे माल की कीमतों में उतार‑चढ़ाव, और विनिमय दर के जोखिमों से जूझ रही हैं। यह ऋण‑सेवा बोझ न केवल सार्वजनिक निवेश को सीमित करता है, बल्कि रोजगार सृजन और गरीबी उन्मूलन के लक्ष्य को भी धूमिल कर देता है। अगर वार्षिक $900 अर्ब को विकास उपक्रमों में पुनर्निर्देशित किया जाए, तो शिक्षा, स्वास्थ्य, जल–स्वच्छता और नवीनीकृत ऊर्जा जैसी प्राथमिकताओं को सुदृढ़ करने की संभावना बढ़ती है।
हालाँकि, इस तरह के व्यापक राहत उपाय के लिए कई नियामकीय और राजनैतिक चुनौतियाँ भी हैं। प्रथम, अंतर्राष्ट्रीय बैंकों और कोटेशन एजेंसियों द्वारा ऋण पुनर्गठन की शर्तें अक्सर आर्थिक सुधार‑शर्तों (structural adjustment) से जुड़ी होती हैं, जो सामाजिक खर्च को सीमित करने की प्रवृत्ति रखती हैं। द्वितीय, विकास निधियों के प्रभावी उपयोग की निगरानी हेतु पारदर्शी तंत्र की आवश्यकता है, अन्यथा मुक्त धन का दुरुपयोग या अवैध निकासी का जोखिम बना रहता है। तृतीय, प्रमुख उधारदाता देशों की राजकोषीय स्थितियाँ भी अस्थिर हैं; ग्रीनरुचि और उद्योग‑सहायता को प्राथमिकता देने वाली नीतियों से गरीबी‑उन्मुख राहत के बजट में कटौती हो सकती है।
इन बाधाओं को देखते हुए, रिपोर्ट ने तीन प्रमुख सिफारिशें प्रस्तुत की हैं: (i) बहुपक्षीय ऋण‑सेवा कवरेज तंत्र (Debt Service Suspension Initiative) को विस्तारित कर, सभी G77 देशों को समान रूप से शर्त‑रहित राहत प्रदान करना; (ii) स्वतंत्र अंतर्राष्ट्रीय निकायों द्वारा पुनःअभिग्रहित धन के उपयोग पर त्रैमासिक ऑडिट करना; (iii) विकसित देशों के साथ द्विपक्षीय समझौतों में सामाजिक विकास को प्राथमिकता देना, ताकि आर्थिक पुनरुत्थान के साथ‑साथ गरीबी‑मुक्त लक्ष्य भी दृढ़ रहे।
यदि इन सिफ़ारिशों को सफलतापूर्वक लागू किया जाता है, तो न केवल विकासशील देशों की कोषीय स्थिति सुधरेगी, बल्कि वैश्विक आर्थिक स्थिरता और सतत विकास लक्ष्य (SDGs) की दिशा में महत्वपूर्ण कदम भी बढ़ेगा। उत्प्रेरक के रूप में, भारत की अपनी विकास‑धारा और ऋण‑ब्याज दरों में सुधार की नीति इस दृष्टिकोण के साथ तालमेल बिठा सकती है, जिससे दोनों पक्षों को प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिल सके। अंततः, ऋण‑सेवा में कटौती को केवल तकनीकी कदम नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग, नियामक लचीलापन और पारदर्शी वित्तीय प्रबंधन का सम्मिलित परिणाम माना जाना चाहिए।
Published: May 7, 2026