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Category: व्यापार

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क्रूड कीमत $105/बारल से बढ़ी, सरकार की ईंधन कर कटौती के बावजूद तेल कंपनियों को घाटा, कीमत बढ़ोतरी की जरूरत

सितंबर 2025 से मई 2026 तक अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की औसत कीमत $105.4 प्रति बैरल तक पहुंच गई है। इस मूल्य उछाल के बावजूद भारत में पेट्रोल, डीजल और एंटी‑नॉबली गैसोलिन की खुदरा कीमतें सरकार द्वारा लागू किए गए अतिरेकी एक्साइज ड्यूटी कटौती के कारण लागत से नीचे बिक रही हैं। परिणामस्वरूप इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (आईओसी), हिंदुस्तान पेट्रोलियम (एचपीसी), रिलायंस इंडस्ट्रीज़ और भारत पेट्रोलियम (बीपीसी) जैसी प्रमुख पेट्रोलियम कंपनियां निरंतर घाटे में operate कर रही हैं।

अनुशंसित मूल्य-निर्धारण तंत्र का अभ्यस्त रिटेल मॉडल अब वित्तीय रूप से अस्थिर हो गया है। औसतन एक लीटर डीजल के लिए कंपनियां लगभग ₹2–₹3 के नुकसान पर बेच रही हैं, जबकि कच्चे तेल की लागत में पिछले छः महीनों में 30 % से अधिक की बढ़ोतरी हुई है। इससे न केवल कंपनी की परिचालन आय घटती है, बल्कि ऋण पुनर्भुगतान और भविष्य के पूँजी निवेश, विशेषकर हाइड्रोजन, बायो‑फ्यूल और कार्बन कैप्चर जैसी नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं की तैयारी पर भी दबाव बनता है।

सरकार ने अप्रैल 2026 में पेट्रोल एवं डीजल पर कुल एकत्रित एक्साइज ड्यूटी को 30 % तक घटाकर रुपए 1 200 प्रति लीटर कर दिया, इस कदम का उद्देश्य उपभोक्ता महंगाई को काबू में रखना था। हालांकि, इस कटौती का बजट-रिकवरी पक्ष पर असर स्पष्ट है: राजस्व में प्रतिदिन लगभग ₹1 800 करोड़ की कमी आई है, जिससे वित्तीय वर्ष 2026‑27 की अनुमानित साधारण कोटा में अंतर आया। इससे आयकर, वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) और अन्य अप्रत्यक्ष करों में रिफंड की जरूरत बढ़ेगी, जबकि सार्वजनिक खर्च को समर्थन देने के लिए फिस्कल दायरा कमजोर हो रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा नीति‑उपाय अस्थायी राहत प्रदान कर सकते हैं, परंतु “हवा में फ़ंसाए गए” कच्चे तेल की कीमतों को अनिश्चितकाल तक पतला नहीं किया जा सकता। भारतीय औद्योगिक नीति अनुसंधान केंद्र (आईपीआरसी) ने हवाला देते हुए कहा, “कर्मचारी लागत, लॉजिस्टिक खर्च और परिकल्पित नवीकरणीय निवेश को देखते हुए, तेल कंपनियों को धीरे‑धीरे कीमत बढ़ाने की दिशा में कदम उठाने चाहिए, नहीं तो पूँजी भरपाई के लिए बड़े‑स्केल ऋणनविकरण की ओर रुख करना पड़ेगा।”

नवीनतम सुझावों में दो मुख्य बिंदु सामने आए हैं। पहला, मूल्य वृद्धि को चरणबद्ध तरीके से लागू करना, जिससे उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) पर अत्यधिक दबाव न पड़े। दूसरा, कंपनी‑स्तर पर “इंधन मूल्य बीमा” जैसी वित्तीय साधनों को अपनाकर कच्चे तेल की कीमत में उतार‑चढ़ाव के जोखिम को कम किया जा सके। इसके अतिरिक्त, नियामक मंडल (एनएफएससी) को नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश को तेज करने के लिए विशेष सब्सिडी स्कीम और कर प्रोत्साहन प्रदान करने की सिफारिश की गई है, ताकि कंपनियां दीर्घकालिक रूप से ‘ग्रीन किट’ की ओर रुख कर सकें।

उपभोक्ता पक्ष पर प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पेट्रोल पर कीमत में 5 % की अतिरिक्त वृद्धि का अनुमान लगाने पर, मध्यम आय वर्ग के लिए मासिक यात्रा खर्च में लगभग ₹3 000–₹4 000 की वृद्धि हो सकती है। यह वृद्धि मौजूदा महंगाई‑विरोधी नीतियों के साथ तालमेल बिगाड़ सकती है। इसलिए सरकार को मूल्यवृद्धि के साथ ही सामाजिक सुरक्षा जाल—जैसे सार्वजनिक परिवहन सब्सिडी और ईंधन अधिसूचना—को सुदृढ़ करने की आवश्यकता है।

समग्र रूप में, कच्चे तेल की कीमत में निरंतर उछाल, कर नीति में मौजूदा ढील और तेल कंपनियों के वित्तीय तनाव के बीच संतुलन स्थापित करना अब नीति निर्धारकों की प्राथमिक चुनौती बन गया है। लागत‑उत्सर्जन‑वित्तीय स्थिरता के त्रिकोण पर विचार करते हुए, क्रमिक मूल्यवृद्धि, नवाचारी वित्तीय साधन और नवीकरणीय ऊर्जा की ओर तेज़ी से बदलाव को प्रोत्साहित करना ही आगामी आर्थिक वर्ष में पूँजी‑बाजार, रोजगार और उपभोक्ता हित को बचाए रखने का व्यावहारिक मार्ग दिखाता है।

Published: May 9, 2026