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Category: व्यापार

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एपोलो के सीईओ रोलियन ने बाजार में संभावित सुधार की चेतावनी दी, प्रतिद्वंद्वी बीमा कंपनियों की ‘भयानक’ प्रथाओं की निंदा की

एपोलो ग्लोबल मैनेजमेंट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मार्क रोलियन ने 6 मई को वित्तीय बाजारों में संभावित सुधार (मार्केट करेक्शन) के जोखिम को लेकर गंभीर चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि वर्तमान में बाजार अनपेक्षित झटकों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है और इन स्थितियों से बचने के लिए कंपनी ने अपने पोर्टफोलियो को रक्षा‑उन्मुख रणनीति की ओर मोड़ दिया है।

रोलियन ने बताया कि कंपनी ने नकदी आरक्षित बढ़ा कर, नई लेवरेज‑आधारित अधिग्रहण को धीमा कर के और जोखिम‑उच्च निवेशों की समीक्षा करके अपने जोखिम प्रोफ़ाइल को संतुलित किया है। ऐसी कदम भारतीय निजी‑इक्विटी और वैकल्पिक निवेश बाजारों में भी प्रभाव डालेंगे, क्योंकि एपीले जैसे बड़े वैश्विक फंडों की निवेश‑नीति में बदलाव पूंजी प्रवाह एवं डिविडेंड नीति को प्रभावित कर सकता है।

बाजार सुधार की संभावनाओं का संकेत कई कारकों से मिल रहा है: वैश्विक ब्याज दरों में स्थिरता की अनिश्चितता, बुनियादी वस्तुओं की कीमतों में उतार‑चढ़ाव, और घरेलू कंज्यूमर सेंटिमेंट में मंदी का दबाव। यदि ऐसा सुधार हुआ, तो इक्विटी, बॉन्ड और डेरिवेटिव बाजारों में अस्थिरता बढ़ सकती है, जिससे संस्थागत निवेशकों और छोटे निवेशकों दोनों को अतिरिक्त जोखिम सहन करना पड़ेगा।

रोलियन ने इसके साथ ही भारतीय बीमा क्षेत्र में मौजूद “भयानक” प्रथाओं की भी खुली निंदा की। उनका कहना है कि कुछ प्रतिस्पर्धी बीमा कंपनियां अनुचित प्रीमियम मूल्य निर्धारण, क्लेम प्रक्रिया में देरी और उपभोक्ता डेटा के दुरुपयोग जैसी नीतियों को अपनाकर बाजार में अनुचित लाभ कमा रही हैं। ऐसी प्रथाएं न केवल उपभोक्ता हितों को नुकसान पहुंचाती हैं, बल्कि नियामक संस्थाओं की विश्वसनीयता को भी धूमिल करती हैं।

यह आलोचना भारतीय बीमा नियामक अभिकेंद्र (IRDAI) के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल उठाती है: क्या मौजूदा नियामक ढाँचा अनियमितताओं को रोकने में सक्षम है? विशेषज्ञों का मानना है कि बीमा कंपनियों के प्रीमियम निर्धारण और क्लेम निपटान में अधिक पारदर्शिता, साथ ही उपभोक्ता शिकायतों के त्वरित निपटान के लिए मजबूत तंत्र की आवश्यकता है।

सार्वजनिक दृष्टिकोण से देखे तो बाजार सुधार और बीमा क्षेत्र की अनियमित प्रथाओं दोनों ही आर्थिक स्थिरता और उपभोक्ता विश्वास को प्रभावित करेंगे। अगर नियामक कार्रवाई में ढील रह गई तो उपभोक्ताओं को उच्च लागत और सेवाओं में कमी का सामना करना पड़ सकता है, जबकि निवेशकों को संभावित बाजार गिरावट से बचने के लिए अपनी पोर्टफोलियो संरचना पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है।

रोलियन की चेतावनी इस बात की याद दिलाती है कि वित्तीय प्रणाली में जोखिम प्रबंधन, नियामक सुदृढ़ीकरण और कॉरपोरेट जवाबदेही के बिना कोई भी सुधार स्थायी नहीं हो सकता। भारतीय नीति निर्माताओं के लिए यह एक संकेत है कि आर्थिक घोषणा एवं सुधार कार्यक्रमों को वास्तविक जोखिमों और उपभोक्ता रक्षा के साथ संतुलित करना आवश्यक है।

Published: May 6, 2026