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Category: व्यापार

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एआई-प्रेरित छंटनी से भारत की सामाजिक सुरक्षा जाँच पर खड़ी

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) तकनीक का तेज़ी से अपनाना भारतीय उद्योग में उत्पादकता बढ़ा रहा है, पर साथ ही यह कार्यस्थल में बड़े पैमाने पर छंटनी का कारण बन रहा है। एआई‑आधारित स्वचालन ने विशेषकर बीमा, बँकिंग, बी‑पीओ, तथा छोटे‑मध्यम उद्यमों (एसएमई) में नौकरियों को बदल दिया है, जिससे अनुमानित 6‑7 % कार्यबल—लगभग 2 करोड़ लोग—को निकट भविष्य में जोखिम का सामना करना पड़ सकता है।

इस परिदृश्य में सरकार की सुरक्षा जाल—जिसमें कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ), कर्मचारी राज्य बीमा (ईएसआईसी), राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजना (एनएसएसपी) और प्रधानमंत्री रोजगार योजना (पीआरईएफ) जैसी प्रणाली शामिल है—की क्षमता का परीक्षण हो रहा है। वर्तमान में इन योजनाओं का कवरेज मुख्यतः औपचारिक सेक्टर तक सीमित है, जबकि एआई‑से जुड़ी छंटनी का बड़ा हिस्सा अनौपचारिक और प्रौद्योगिकी‑संबंधी छोटे‑मध्यम उद्यमों के कर्मचारियों को प्रभावित कर रहा है। इस कारण से बेक़रार वर्ग के लिए तत्काल आय सुरक्षा और पुनः प्रशिक्षण दोनों की आवश्यकता है।

भले ही सरकार ने कौशल विकास के लिए राष्ट्रीय कौशल विकास निगम (एनएसडीसी) और भारत कौशल प्रणाली (बीएसएस) जैसी संस्थाओं की स्थापना की है, पर उनका पहुँच एवं स्केल अभी भी सीमित है। अधिकांश एआई‑चलित नौकरियों के विस्थापन के बाद आवश्यक उन्नत तकनीकी कौशल—जैसे मशीन लर्निंग, डेटा एनालिटिक्स, और क्लाउड कंप्यूटिंग—के लिए प्रशिक्षण की आपूर्ति मौजूदा मांग से काफी पीछे है। परिणामस्वरूप कार्यकर्ता वर्ग में असुरक्षा बढ़ रही है और सामाजिक कल्याण पर दबाव स्पष्ट हो रहा है।

वित्तीय दरिद्रता को रोकने हेतु मौजूदा सामाजिक सुरक्षा नियमों में संशोधन की महत्त्वपूर्ण मांग उभरी है। विशेषज्ञों का मानना है कि (i) अनौपचारिक क्षेत्र के कामगारों को भी ईपीएफ‑आधारित पेंशन और ब unemployment benefits (अस्थायी) के दायरे में लाना, (ii) एआई‑प्रेरित छंटनी के मामलों में रोजगार पुनःस्थापना के लिए विशेष निधि स्थापित करना, और (iii) कौशल उन्नयन के लिए सरकारी‑निजी साझेदारी (पीपीपी) को तेज़ करना आवश्यक है।

साथ ही, नियामकीय ढांचे में एआई अपनाने पर स्पष्ट दिशानिर्देश स्थापित करना जरूरी है। वर्तमान में भारत में एआई‑संबंधी श्रम नियमन में काफी अंतराल है; न तो न्यूनतम चेतावनी अवधि के लिये विशिष्ट प्रावधान हैं और न ही रोजगार परिवर्तन के दौरान समर्थन तंत्र। इस अभाव के कारण कंपनियों द्वारा बड़े पैमाने पर बेंचमार्किंग और आउटसोर्सिंग आसान हो रही है, जिससे श्रमिक अधिकारों का हनन हो सकता है।

संक्षेप में, एआई‑से जुड़ी छंटनी न केवल तकनीकी बदलाव का संकेत है, बल्कि भारत की सामाजिक सुरक्षा और श्रम नीति की लचीलापन की भी कसौटी है। यदि सरकार तुरंत व्यापक कवरेज, पुनः प्रशिक्षण निधि और नियामकीय स्पष्टता प्रदान नहीं करती, तो आर्थिक पुनःस्थापना की प्रक्रिया में बाधाएँ उत्पन्न होंगी और आय असमानता में वृद्धि होगी। यह आवश्यक है कि नीति निर्माताओं, उद्योग प्रतिनिधियों और शैक्षिक संस्थानों के बीच समन्वय स्थापित हो, ताकि एआई के लाभ को सामाजिक स्थिरता के साथ संतुलित किया जा सके।

Published: May 9, 2026