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Category: व्यापार

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ऊर्जा संकट का बढ़ता बोझ: भारत में नीति‑विरोधी भ्रम और तैयारी की कमी

दशकों की संतुष्टिपूर्ण नीति‑प्रवृत्ति अब भारत को एक गंभीर ऊर्जा घोटाले के कगार पर ला रही है। विदेशी तेल और द्रवित प्राकृतिक गैस (LNG) के आयात पर निर्भरता, साथ ही घरेलू हाइड्रोकार्बन उत्पादन का निरंतर गिरावट, देश के ऊर्जा सुरक्षा आरेख को अस्थिर बना रही है।

वर्तमान में भारत की प्राथमिक ऊर्जा का लगभग 80 % आयातित तेल तथा गैस पर निर्भर है। वैश्विक आपूर्ति में व्यवधान—जैसे रूषियन आक्रमण‑के‑बाद तेल की कीमतों में तीव्र उछाल और मध्य पूर्व में पाइपलाइन बाधाएँ—के कारण कीमतों में अचानक बढ़ोतरी भारतीय औद्योगिक उत्पादन और उपभोक्ता खर्च दोनों पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है। इस परिप्रेक्ष्य में सरकारी ऊर्जा रणनीतियों का अभाव एक गंभीर मुद्दा बन गया है।

वामपंथ और दक्षिणपंथ दोनों ही ऊर्जा संप्रभुता की शब्दावली का उपयोग कर जनता को आश्वस्त करने की कोशिश कर रहे हैं, पर इनके प्रस्ताव अक्सर वास्तविकता से दुरस्थ रहते हैं। वामपंथ द्वारा नई कोयला खनन सुविधाओं के विस्तार की वकालत और दक्षिणपंथ द्वारा निजी तेल‑गैस कंपनियों को अतिरिक्त अनुदान देने के निर्णय, दोनों ही दीर्घकालिक सततता और पर्यावरणीय मानकों के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रहे हैं। परिणामस्वरूप, नीति‑निर्माताओं के पास न तो पर्याप्त घरेलू उत्पादन की नींव है और न ही तेज़ी से नवीकरणीय ऊर्जा के समाकलन के लिए स्पष्ट रोडमैप।

नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में भारत ने 2030 तक नवीकरणीय हिस्सेदारी 45 % तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा है, पर लक्ष्य प्राप्ति की गति अभी भी बहुत धीमी है। सौर और पवन ऊर्जा के अनुबंध मूल्य में निरंतर गिरावट के बावजूद, ग्रिड‑एकीकरण, बैटरी भंडारण और क्षमताबद्ध नियोजन में खामियां बनी हुई हैं। यह स्थिति ऊर्जा आपूर्ति की अस्थिरता को और अधिक बढ़ा रही है, विशेषकर शीतकालीन और गर्मी के चरम मौसम में, जब बिजली मांग में तीव्र वृद्धि देखी जाती है।

ऊर्जा सुरक्षा के लिए रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का निर्माण भारत में अभी प्रारम्भिक चरण में है। जबकि कई विकसित देशों ने 90‑दिन की आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त भंडार स्थापित कर रखे हैं, भारत की भंडार क्षमता वर्तमान आयात निर्भरता को घटाने में अपर्याप्त है। इस अंतर को पाटने के लिए त्वरित निवेश, स्पष्ट नियामक ढांचा और सार्वजनिक‑निजी भागीदारी को सुदृढ़ करने की जरूरत है।

उपभोक्ता स्तर पर ऊर्जा कीमतों में लगातार बढ़ोतरी से महंगाई दर में दबाव बढ़ रहा है, जिससे मध्यम वर्ग के खर्च पर सीधा असर पड़ रहा है। उद्योगों को भी उत्पादन लागत में बढ़ोतरी का सामना करना पड़ रहा है, जिससे निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता घट सकती है। इस परिप्रेक्ष्य में, सरकार को न केवल आपूर्ति‑सुरक्षा को मजबूत करना चाहिए, बल्कि ऊर्जा की कीमत को स्थिर रखने हेतु दीर्घकालिक नीतियों का निर्माण भी करना आवश्यक है।

भविष्य में, यदि भारत ऊर्जा नीति में मौजूदा विफलताओं को सुधारने में विफल रहता है, तो वह न केवल अपने विकास अभिलाषाओं को ही नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार में अपनी प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति को भी जोखिम में धकेल सकता है। व्यापक योजना, पारदर्शी नियामक ढांचा और दोनों राजनैतिक धड़ों का मिलजुल कर काम करना ही इस ऊर्जा संकट को टालने की सबसे बड़ी संभावना है।

Published: May 8, 2026