उल्ट्राप्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों की परिभाषा पर महा की प्रतीक्षा, उद्योग को बड़ा झटका
भारत की उपभोक्ता‑सुरक्षा संस्था MAHA ने हाल ही में स्पष्ट परिभाषा की मांग की है, जिससे दही, पीनट बटर तथा कई तैयार‑खाद्य को 'उल्ट्राप्रोसेस्ड' वर्ग में वर्गीकृत किया जा सके। यह कदम रॉबर्ट एफ. केनेडी जूनियर द्वारा प्रस्तावित वैज्ञानिक मानकों की प्रतीक्षा में है, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैलाई गयी स्वास्थ्य‑सुरक्षा मानकों के साथ समन्वित करने की आशा की जा रही है।
यदि नियामक ढाँचा सख़्त हो गया, तो खाद्य उद्योग के दो प्रमुख श्रेणियों पर तत्काल प्रभाव पड़ेगा:
- दही एवं अन्य फ़ार्मेंटेड उत्पाद: वर्तमान में 150‑200 लाख टन दही का उत्पादन भारत में हो रहा है। वर्गीकरण में बदलाव के कारण प्री‑पैकेज्ड, फ्लेवर्ड दही की कीमतें 10‑15% तक बढ़ सकती हैं, जिससे मौसमी माँग में गिरावट और छोटे‑व्यापारियों की मार्जिन घट सकती है।
- पीनट बटर और अन्य नट‑स्प्रेड: आयातित पीनट बटर की वार्षिक मात्रा लगभग 5 लाख टन है। यदि इसे उल्ट्राप्रोसेस्ड घोषित किया गया, तो लेबलिंग, अतिरिक्त वस्तु कर (GST) एवं आयात शुल्क में संशोधन संभव है, जिससे उपभोक्ता कीमतें 12‑18% बढ़ सकती हैं।
वित्तीय दृष्टि से देखें तो FSSAI द्वारा नई परिभाषा लागू करने के बाद, कंपनियों को उत्पादन प्रक्रिया में बदलाव, अतिरिक्त परीक्षण एवं प्रमाणन हेतु अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ेगा। अनुमानित रूप से इन अतिरिक्त लागतों का औसत 4‑6% उत्पादन लागत में जुड़ाव हो सकता है, जिससे शेयरधारक मूल्य पर दबाव पड़ेगा और दीर्घकालिक निवेश योजना में पुनः‑समीक्षा की आवश्यकता होगी।
नियामकीय पहल के साथ ही उपभोक्ता हित में संभावित लाभ भी हैं। विश्व स्तर पर उल्ट्राप्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों से जुड़ी मोटापा, मधुमेह और कार्डियोवस्कुलर रोगों की वृद्धि को देखते हुए, स्पष्ट लेबलिंग से जागरूकता बढ़ेगी और स्वास्थ्य‑संकल्पित उपभोक्ताओं की खरीदारी प्रवृत्ति सशक्त होगी। हालांकि, यदि लेबलिंग अपर्याप्त या भ्रमित करने वाली रही, तो उपभोक्ता संरक्षण के सिद्धांतों पर प्रश्नचिन्ह लग सकता है।
वर्तमान में भारत में खाद्य लेबलिंग नियमों को लेकर कई उद्योग समूहों ने लचीलापन की माँग की है, यह कहते हुए कि अत्यधिक प्रतिबंध छोटे एवं मध्यम उद्यमों को संघर्ष का सामना करवा सकते हैं। इस संदर्भ में नियामक संगठनों को नीतिगत शिथिलता और बाजार प्रतिस्पर्धा के बीच संतुलन बनाते हुए, संक्रमणकालीन चरण के लिए कर‑छूट या तकनीकी सहायता प्रदान करने पर विचार करना चाहिए।
सारांश में, MAHA की सख़्त परिभाषा की अपेक्षा खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के लिए एक प्रमुख मोड़ है। यदि रॉबर्ट एफ. केनेडी जूनियर द्वारा निर्धारित मानदंडों को भारत में अपनाया जाता है, तो नियामक पुनर्संरचना, लागत‑प्रभाव विश्लेषण और उपभोक्ता जागरूकता कार्यक्रमों की आवश्यकता पड़ेगी। इस बदलाव की दिशा तय होगी तो भारतीय खाद्य बाजार की वृद्धि गति, रोजगार सृजन और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक प्रभाव स्पष्ट रूप से परिभाषित हो जाएगा।
Published: May 3, 2026