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Category: व्यापार

इलेक्ट्रिक वाहन अपनाने से तेल मूल्य झटके से बचाव: विश्व के कई देशों की पॉलिसी और भारत के लिए सीख

पिछले दो वर्षों में तेल की कीमतों में अस्थिरता ने कई विकासशील देशों को वैकल्पिक ऊर्जा की ओर अग्रसर किया है। कोस्टा रीका, लैटिन अमेरिकी, एशियाई और अफ्रीकी राष्ट्रों में इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) की बिक्री तेज़ी से बढ़ी है, जिससे ईंधन आयात बिल में कमी और पर्यावरणीय लाभ दोनों मिल रहे हैं। इस प्रवृत्ति को भारत के आर्थिक संदर्भ में देखना आवश्यक है, क्योंकि भारत भी तेल आयात पर भारी निर्भर है।

वैश्विक ईवी अपनाने के आर्थिक प्रेरक कारण

2025‑2026 में अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में 30‑40 प्रतिशत तक झटके देखने को मिले, जिससे पेट्रोल‑डिज़ल के उपभोक्ता मूल्य (पीएसपी) में उछाल आया। कोस्टा रीका ने 2024‑2025 में ईवी बिक्री को 40 प्रतिशत बढ़ाते हुए, आयात शुल्क में 5 प्रतिशत की कटौती और वैट रिबेट जैसी नीतियों से खुद को तेल मूल्य शॉक से बचाया। इसी तरह, ब्राज़ील, कोलंबिया और पेरू जैसे लैटिन अमेरिकी देशों ने स्थानीय असेंबली प्लांट स्थापित कर लागत घटाई, जिससे मध्यम वर्ग के लिए ईवी अधिक सुलभ हुए।

आफ्रीका में बुनियादी ढांचे का विकास

केन्या व घाना जैसी अफ्रीकी economies ने अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों की मदद से चार्जिंग नेटवर्क बनाने में निवेश किया है। अफ्रीका विकास बैंक द्वारा वित्त पोषित 2,000 किलोमीटर की सार्वजनिक चार्जिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर ने ईवी की उपयोगिता को बढ़ाया और आयातित पेट्रोलियम पर निर्भरता घटाई। इन देशों में ईवी की कीमतें 15‑20 प्रतिशत तक घट गईं, जिससे उपभोक्ता के खर्च में कमी आई।

भारत में संभावनाएँ और चुनौतियाँ

भारत ने 2025 में तेल आयात पर लगभग $120 बिलियन खर्च किया, जो विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव डाल रहा है। भारत की इलेक्ट्रिक वाहन नीति (FAME II) 2026 में 10,000 करोड़ रुपये की सब्सिडी प्रदान कर रही है, जिसमें 7,000 करोड़ रुपये बैटरी मॉड्यूल के लिए और 3,000 करोड़ रुपये चार्जिंग नेटवर्क विस्तार के लिए earmarked हैं। फोरकास्ट के अनुसार, 2026 तक भारत में ईवी बिक्री 5 लाख यूनिट तक पहुँच सकती है, जिससे लगभग 1.2 लाख रोजगार सृजन की संभावना है।

तथापि, नीति‑निर्माताओं को कई बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है। वर्तमान में चार्जिंग स्टेशनों की घनत्व केवल 150 स्टेशनों/लाख जनसंख्या है, जो यूरोपीय मानकों से पांच गुना कम है। इसके अलावा, इंधन‑सबसिडी को धीरे‑धीरे हटाने के बावजूद, ईवी की शुरुआती कीमत अभी भी उपभोक्ता के लिए महंगी है, जो मध्यम वर्ग में अपनाने की गति को सीमित कर रही है। टाटा मोटर्स व महिंद्रा जैसी घरेलू कंपनियों ने स्थानीय बैटरी इकाइयों के साथ मिलकर लागत घटाने की कोशिश की है, पर आयातित लिथियम‑आयन बैटरियों की कीमत में अस्थिरता इस प्रयास को कमजोर करती है।

नियामकीय ढांचा और नीति‑विरोधाभास

भारत में इलेक्ट्रिक वाहन मानक (EV‑S) अभी मंडी में हैं, जबकि कई राज्य ईंधन क्षतिपूर्ति को हटाने के साथ ही अपने-अपने सब्सिडी पैकेज जारी कर रहे हैं। यह असंगत नीति‑परिदृश्य निवेशकों को अनिश्चितता में डाल रहा है, जिससे विदेशी ईवी निर्माताओं की भारतीय बाजार में प्रवेश में देरी हो रही है। विशेषज्ञों का तर्क है कि अधिक स्पष्ट राष्ट्रीय स्तर की मानकों, साथ ही कर व शुल्क में समरूपता से बाजार को तेज़ी से स्थापित किया जा सकता है।

उपभोक्ता और सार्वजनिक हित पर प्रभाव

ईवी अपनाने से शहरी वायु प्रदूषण में कमी के साथ-साथ पेट्रोलियम उपयोग में घटाव के कारण राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा में सुधार की संभावना है। यह नीतिगत बदलाव न केवल आयात पर निर्भरता कम करेगा, बल्कि भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं को भी साकार करेगा। परंतु, सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि सब्सिडी का लाभ केवल उच्च आय वर्ग तक सीमित न रहे, बल्कि ग्रामीण एवं कमजोर वर्ग के लिए भी सुलभ मॉडल विकसित किए जाएँ।

निष्कर्षतः, कोस्टा रीका तथा अन्य विकासशील देशों के ईवी अपनाने के मॉडल भारत के लिये एक उपयोगी रोडमैप प्रस्तुत करते हैं—उच्च लागत को कम करने के लिये स्थानीय उत्पादन, विस्तृत चार्जिंग नेटवर्क तथा स्थायी नियामक ढाँचा आवश्यक है। इन तत्वों को सुदृढ़ करके ही भारत तेल मूल्य शॉक से बचाव और स्थिर आर्थिक विकास की दिशा में प्रभावी कदम उठा सकता है।

Published: May 3, 2026